West Bengal News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंगूर की धरती से बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का शंखनाद कर दिया है। पीएम ने ममता सरकार पर सिंडिकेट राज और घुसपैठ जैसे तीखे हमले बोले। लेकिन भाषण के अंत में उन्होंने एक ऐसा सियासी बम फोड़ा जिसने सबको चौंका दिया। पीएम ने टीएमसी को याद दिलाया कि उनकी पार्टी की भाजपा से पुरानी ‘दुश्मनी’ नहीं है। उन्होंने जनता को उस दौर की याद दिलाई जब ममता बनर्जी ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक गठबंधन की पूरी कहानी।
जब ‘कमल’ को साथ लाने को राजी हुईं ममता
साल 1998 था और तृणमूल कांग्रेस का गठन नया-नया हुआ था। उस समय राजनीतिक पंडितों का मानना था कि ममता के अलग होने से कांग्रेस कमजोर होगी और लेफ्ट को फायदा मिलेगा। ममता बनर्जी शुरू में भाजपा को ‘जूनियर पार्टनर’ मान रही थीं। उनका ध्यान कोलकाता के आसपास के मुस्लिम वोट बैंक पर था। उन्हें डर था कि भाजपा से खुला गठबंधन नुकसानदेह हो सकता है।
भाजपा के लिए दिखाई ‘ममता’
लेफ्ट और कांग्रेस की लड़ाई के बीच ममता ने एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा उनके लिए ‘राजनीतिक अछूत’ नहीं है। 1996 में भाजपा को बंगाल में सिर्फ 6 फीसदी वोट मिले थे। इसके बावजूद भाजपा ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की रणनीति बनाई थी। ममता को भी लगा कि लेफ्ट को हराने के लिए उन्हें साथ की जरूरत है। कई दौर की बातचीत के बाद 1998 लोकसभा चुनाव के लिए दोनों दलों में गठबंधन हो गया।
सीट बंटवारे पर तनातनी और सोनिया की एंट्री
गठबंधन की राह आसान नहीं थी। भाजपा 25 सीटें मांग रही थी, लेकिन ममता ने बातचीत से पहले ही 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए। इससे भाजपा नेता नाराज हो गए। उधर, कांग्रेस को बचाने के लिए सोनिया गांधी ने मालदा और कोलकाता में रैलियां कीं। इसी दौरान ममता बनर्जी पर उनकी ही पार्टी के असंतुष्टों ने हमला भी किया। वजह यह थी कि उन्होंने कुछ सीटें भाजपा के लिए छोड़ दी थीं।
बंगाल में पहली बार खिला ‘कमल’
साल 1998 के नतीजों ने सबको चौंका दिया। भाजपा का वोट शेयर 6.8 फीसदी से बढ़कर 10.2 फीसदी हो गया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तपन सिकदर ने दमदम सीट जीतकर इतिहास रच दिया। यह बंगाल में भाजपा की पहली लोकसभा जीत थी। टीएमसी को 7 सीटें मिलीं। इस गठबंधन ने वाम मोर्चे की नींद उड़ा दी थी।
पंचायत चुनाव और ‘बंगाल पैकेज’
लोकसभा के बाद पंचायत चुनावों में भी यह दोस्ती कायम रही। ममता ने 2000 करोड़ रुपये का ‘बंगाल पैकेज’ और ‘नया बंगाल’ बनाने का वादा किया। भाजपा ने भी ‘एजेंडा फॉर एक्शन’ पेश किया। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में ज्योति बसु की पकड़ मजबूत थी। वाम मोर्चे ने पंचायत चुनावों में फिर से बड़ी जीत हासिल की।
मंत्रिमंडल के लिए सीट की कुर्बानी?
साल 1999 के चुनाव में भी गठबंधन जारी रहा। बांकड़ा सीट पर पेंच फंस गया। भाजपा ने सुकुमार बनर्जी को टिकट दिया था, जबकि ममता वहां माकपा के बागी नटबर बागड़ी का समर्थन कर रही थीं। विवाद दिल्ली तक पहुंचा। बाद में ममता ने ऐलान किया कि जीत के बाद वह वाजपेयी मंत्रिमंडल में शामिल होने को तैयार हैं। इसके बाद भाजपा ने बांकड़ा से अपना उम्मीदवार वापस ले लिया।
लेफ्ट के गढ़ में सेंधमारी
साल 1999 के चुनाव में भाजपा-टीएमसी गठबंधन ने दक्षिण बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत की। एनडीए ने यहां तीन सीटें जीतीं और अपना वोट शेयर बढ़ाया। आंकड़ों से पता चला कि कांग्रेस का 24 फीसदी वोट इस गठबंधन की ओर शिफ्ट हो गया था। पीएम मोदी ने आज इसी पुराने रिश्ते की याद दिलाकर बंगाल की सियासत गरमा दी है।

