India News: भारत का इतिहास केवल किलों और राजाओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों के संघर्ष की भी कहानी है जिन्हें सदियों तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा रखा गया। अक्सर हम इतिहास को केवल ‘गुलामी और लूट’ के नजरिए से देखते हैं, लेकिन बहुजन समाज और महिलाओं के लिए ब्रिटिश काल एक ऐसे दौर के रूप में उभरा जिसने अमानवीय बेड़ियों को काटने का काम किया। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में ऐसे कई कानूनी बदलाव किए, जिन्होंने धर्म और परंपरा के नाम पर चल रहे शोषणकारी तंत्र पर सीधी चोट की। आज के जागरूक समाज के लिए इन तथ्यों को जानना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना मानसिक गुलामी से मुक्ति की पहली शर्त है।
अमानवीय कुप्रथाओं का अंत और अंग्रेजों के कड़े कानून
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में सदियों से चली आ रही कई ऐसी प्रथाओं को कानूनन बंद किया गया जो आज सुनने में भी रूह कपा देती हैं। इन सुधारों ने विशेष रूप से शूद्रों (OBC/SC/ST) और महिलाओं के जीवन को नई दिशा दी:
- नरबलि और चरक पूजा पर रोक: 1830 में अंग्रेजों ने नरबलि प्रथा पर रोक लगाई। वहीं 1863 में ‘चरक पूजा’ को प्रतिबंधित किया गया, जिसमें पुल या आलीशान भवनों के निर्माण के समय मजबूती की अंधविश्वासी मान्यता के चलते शूद्रों की बलि दी जाती थी।
- गंगा दान प्रथा की समाप्ति: 1835 में अंग्रेजों ने उस क्रूर प्रथा को रोका जिसमें शूद्रों के पहले तंदुरुस्त पुत्र को गंगा में बहा दिया जाता था।
- सती प्रथा और बहु-विवाह पर लगाम: 4 दिसंबर 1829 को ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा पर रोक लगाकर महिलाओं को जिंदा जलने से बचाया। 1867 में बहु-विवाह प्रथा को भी प्रतिबंधित किया गया।
- कन्या हत्या और स्तन कर का अंत: 1804 में कन्या शिशु हत्या के खिलाफ कानून बना। वहीं, केरल के त्रावणकोर में निचली जाति की महिलाओं पर लगने वाले अपमानजनक ‘स्तन कर’ (Breast Tax) को भी अंग्रेजों ने कानून बनाकर खत्म किया।
सामाजिक न्याय और हक-अधिकारों की बहाली
अंग्रेजों ने भारत के सामाजिक ढांचे में दबे हुए वर्ग को वे अधिकार दिए जो उन्हें हजारों साल से धर्मग्रंथों के नाम पर मना थे। इन सुधारों ने आधुनिक भारत के निर्माण का आधार तैयार किया:
- शिक्षा और संपत्ति का अधिकार: मनुस्मृति के विधान के विपरीत, अंग्रेजों ने अधिनियम 11 के तहत शूद्रों को संपत्ति रखने का हक दिया। 1835 में शिक्षा के दरवाजे सबके लिए खोल दिए गए, जिससे ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर जैसे महापुरुषों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- न्यायिक और सरकारी सुधार: 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के जज बनने पर रोक लगाई थी, क्योंकि उनका मानना था कि वे जाति और मनुस्मृति के आधार पर पक्षपाती न्याय करते हैं। साथ ही, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के माध्यम से सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई।
- देवदासी प्रथा पर प्रहार: मंदिरों में सेवा के नाम पर शूद्र कन्याओं के शारीरिक शोषण (देवदासी प्रथा) को रोकने के लिए अंग्रेजों ने कड़े कदम उठाए। 1921 की जनगणना में अकेले मद्रास में 2 लाख देवदासियों का होना इस शोषण की भयावहता को दर्शाता था।
पाखंड से मुक्ति और वैज्ञानिक सोच का आह्वान
इतिहास गवाह है कि जब 25 दिसंबर 1927 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया, तो वह मानसिक गुलामी के अंत की शुरुआत थी। अंग्रेजों द्वारा शुरू किए गए इन सुधारों को 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान ने पूर्णता दी, जिसने हर नागरिक को बराबरी का अधिकार दिया। आज जब हम मोबाइल, इंटरनेट और हवाई जहाज के युग में हैं, तब भी समाज का एक बड़ा हिस्सा अंधविश्वास और पाखंडी बाबाओं के जाल में फंसा है।
महात्मा ज्योतिबा फुले ने अंग्रेजों को बहुजनों का ‘भाग्यविधाता’ इसीलिए कहा क्योंकि उनके कानूनों ने वह सम्मान दिया जो समाज ने कभी नहीं दिया था। आज के शिक्षित वर्ग को यह समझने की जरूरत है कि हमारा उत्थान विज्ञान और संविधान से होगा, न कि रूढ़िवादी परंपराओं से। हमें अंधविश्वास को त्यागकर मानवतावादी और तार्किक समाज के निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए।


