Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और मेरिट को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि अगर आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी जनरल कैटेगरी की कट-ऑफ से ज्यादा अंक लाता है, तो उसे शॉर्टलिस्टिंग के चरण में ही ओपन श्रेणी में माना जाएगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए भर्ती नियमों में स्पष्टता ला दी है। इस फैसले से उन मेधावी छात्रों को बड़ी राहत मिली है जो अपनी काबिलियत के दम पर जनरल मेरिट में जगह बना रहे थे।
क्या था पूरा विवाद और भर्ती प्रक्रिया?
यह मामला साल 2022 में राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा शुरू की गई एक भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। इसमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क के 2,756 पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट शामिल थे। नियम के मुताबिक, हर श्रेणी में रिक्तियों के पांच गुना उम्मीदवारों को अगले चरण के लिए चुनना था। जब परिणाम आया, तो चौंकाने वाली बात सामने आई। एससी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस जैसे आरक्षित वर्गों की कट-ऑफ सामान्य श्रेणी से भी ऊपर चली गई। इसके कारण कई प्रतिभाशाली छात्र चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच का कड़ा रुख
प्रभावित उम्मीदवारों ने राजस्थान हाई कोर्ट में अपनी आवाज उठाई। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि जो उम्मीदवार बिना किसी रियायत के जनरल कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में ही रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सबसे पहले योग्यता के आधार पर ओपन कैटेगरी की लिस्ट तैयार की जाए। इसके बाद ही आरक्षित श्रेणियों की सूचियां बनाई जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने गलत तरीके से बाहर किए गए छात्रों को टाइपिंग टेस्ट में शामिल करने का आदेश भी दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ‘डबल बेनिफिट’ वाली दलील
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि इससे आरक्षित वर्ग को दोहरा लाभ मिलेगा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि ‘ओपन’ कैटेगरी किसी के लिए आरक्षित कोटा नहीं है। यह सभी जातियों और वर्गों के लिए केवल मेरिट के आधार पर खुली होती है। कोर्ट ने कहा कि केवल फॉर्म में अपनी कैटेगरी लिख देने से किसी का मेरिट का अधिकार खत्म नहीं होता। यदि कोई छात्र सामान्य वर्ग से बेहतर प्रदर्शन करता है, तो वह ओपन कैटेगरी में नियुक्ति का हकदार है।
मेरिट और समानता के अधिकार की जीत
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी और आर.के. सभरवाल जैसे पुराने ऐतिहासिक मामलों का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि उच्च मेरिट वाले छात्रों को उनकी जाति के आधार पर अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस दत्ता ने लिखा कि भर्ती प्रक्रिया में स्पष्ट अवैधता होने पर सुधार जरूरी है। यह फैसला सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवैधानिक समानता के सिद्धांत को और मजबूत करता है। अब सभी विभागों को इसी मेरिट आधारित फार्मूले का पालन करना होगा।
