Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण और पूर्व राजपरिवार के बीच चल रहे 400 करोड़ रुपये के भूमि विवाद में नया मोड़ दिया है। शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जो ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखता था। अब हाईकोर्ट को इस मामले की योग्यता पर चार सप्ताह में फैसला देना होगा।
यह विवाद जयपुर के मध्य हिस्से में स्थित हथरोई गांव की जमीन को लेकर है। यह भूमि अब शहरी क्षेत्र का हिस्सा बन चुकी है। जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने इस जमीन को अपने रिकॉर्ड में ‘सिवाई चक’ यानी बिना खेती वाली सरकारी जमीन दर्ज किया था। प्राधिकरण का दावा है कि इस संपत्ति का मौजूदा बाजार मूल्य लगभग 400 करोड़ रुपये है।
जेडीए ने अदालत में कहा कि नगर निकाय ने 1990 के दशक में ही इस जमीन पर कब्जा कर लिया था। उनका यह भी तर्क है कि जमीन को शाही परिवार की निजी संपत्ति के रूप में कभी दर्ज नहीं किया गया। 1993 से 1995 के बीच भूमि के बड़े हिस्से का कानूनी रूप से अधिग्रहण किया गया और मुआवजा भी दिया गया।
वहीं पूर्व राजपरिवार की ओर से दीया कुमारी के परिवार का पक्ष है कि यह जमीन उनकी निजी संपत्ति है। उन्होंने 2005 में इस मालिकाना हक को लेकर अदालत में मुकदमा दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2011 में अपने फैसले में शाही परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने उन्हें जमीन का मालिक घोषित कर दिया था।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज
जेडीए ने 2012 में ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने नवंबर 2023 में इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। इसने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बिना गहन जांच के बरकरार रखा। जेडीए ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को जेडीए की अपील को तकनीकी कारणों से खारिज करने का कोई ठोस आधार नहीं था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह जेडीए की अपील पर योग्यता के आधार पर विचार करे। अदालत ने हाईकोर्ट को चार सप्ताह के भीतर इस पर फैसला सुनाने और अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा है। इससे मामले में नया जीवन आ गया है।
विलय समझौते और संपत्ति के दावे पर बहस
मामले की जड़ 1949 के उस समझौते से जुड़ी है जब जयपुर रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ था। पूर्व शाही परिवार का दावा है कि इस समझौते के तहत यह जमीन उनकी निजी संपत्ति के रूप में पंजीकृत थी। उनका कहना है कि यह जमीन सरकारी भूमि नहीं थी।
जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी इस दावे को चुनौती देती है। उनका तर्क है कि आधिकारिक राजस्व रिकॉर्ड में इसे कभी भी निजी संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं किया गया। जेडीए के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि यह सार्वजनिक संपत्ति का मामला है। भूमि का अधिग्रहण पूरा हो चुका है और रिकॉर्ड भी स्थापित हैं।
जेडीए ने संविधान के अनुच्छेद 363 का भी हवाला दिया है। यह अनुच्छेद रियासतों के विलय से जुड़े समझौतों पर न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है। प्राधिकरण का कहना है कि इन सभी गंभीर मुद्दों के बावजूद हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर मामला खारिज कर दिया। इससे सरकारी जमीन गंवाने का खतरा पैदा हो गया।
अब क्या होगा आगे की कार्यवाही
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब राजस्थान हाईकोर्ट को इस मामले को गंभीरता से सुनना होगा। हाईकोर्ट को जेडीए की अपील पर योग्यता के आधार पर फैसला देना है। दोनों पक्षों के तर्कों और सबूतों पर गहन विचार करना होगा।
हाईकोर्ट को चार सप्ताह की समयसीमा के भीतर अपना निर्णय देना है। इसके बाद कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल करनी है। इससे मामले में तेजी आने की उम्मीद है। कई दशकों से लंबित यह विवाद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है।
यह मामला न केवल बड़ी जमीन से जुड़ा है बल्कि कानूनी सिद्धांतों से भी जुड़ा है। इसमें पूर्व राजघरानों की निजी संपत्ति और सरकारी भूमि की परिभाषा शामिल है। सार्वजनिक हित और निजी स्वामित्व के दावों के बीच संतुलन स्थापित करना अदालत के सामने एक बड़ी चुनौती है। पूरे प्रकरण का राजस्थान की राजनीति और प्रशासन पर भी असर पड़ेगा।

