India News: सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म निर्माण से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि फिल्म बनाना एक जोखिम भरा व्यवसाय है और हर फिल्म का सफल होना तय नहीं होता। इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने एक फिल्म निर्माता के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी के आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि महज निवेश वापस न कर पाना आपराधिक इरादा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
धोखाधड़ी साबित करने के लिए शुरू से धोखे की नीयत जरूरी
जस्टिस पीएस नरसिम्हाऔर मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि किसी मामले में धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि शुरू से ही धोखा देने की नीयत थी। कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें निर्माता के खिलाफ कार्रवाई को बरकरार रखा गया था। पीठ ने साफ किया कि अगर बाद में पैसा वापस नहीं किया गया, तो इसे अपने आप में आपराधिक इरादा नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी फिल्म उद्योग से जुड़े वित्तीय लेनदेन के लिए अहम है।
क्या है पूरा मामला? फिल्म निवेश को लेकर हुआ था विवाद
यह मामलाफिल्म निर्माता वी गणेशन से जुड़ा है, जिन्होंने एक फिल्म बनाने के लिए एक निवेशक से पैसे लिए थे। दोनों के बीच समझौता हुआ था कि फिल्म के मुनाफे में निवेशक को हिस्सा दिया जाएगा। बाद में और पैसा लिया गया और कुल निवेश पर हिस्सेदारी तय की गई। फिल्म बनकर तैयार हुई और रिलीज भी हो गई, लेकिन निवेशक को उसका पैसा वापस नहीं मिला। निर्माता ने दो पोस्टडेटेड चेक दिए, लेकिन खाते में पर्याप्त रकम न होने से वे बाउंस हो गए।
चेक बाउंस होने पर दर्ज हुआ धोखाधड़ी का मामला
चेक बाउंस होनेके बाद निवेशक ने निर्माता के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया। निवेशक का कहना था कि निर्माता ने शुरू से ही उसे धोखा देने की योजना बनाई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में निवेश करना जोखिम भरा होता है। अगर फिल्म नहीं चलती है तो निवेशक को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि आर्थिक लेनदेन में विफलता और आपराधिक इरादे में बड़ा अंतर है।


