National News: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं और मवेशियों से होने वाले खतरे पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने बताया कि पिछले बीस दिनों में सड़क पर घूम रहे जानवरों की वजह से दो न्यायाधीश सड़क दुर्घटना का शिकार हुए हैं। इनमें से एक न्यायाधीश रीढ़ की गंभीर चोट से जूझ रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि वह समस्या के समर्थकों और विरोधियों दोनों पक्षों की बात सुनेगी। पीठ ने पूरा समय इस मुद्दे पर विचार के लिए रखा है। सुनवाई में नेशनल हाईवे अथॉरिटी यानी एनएचएई के आंकड़े भी पेश किए गए।
एनएचएई के आंकड़ों पर उठाए सवाल
एनएचएई नेअदालत को बताया कि करीब 1400 किलोमीटर के संवेदनशील हाईवे सेक्शन की पहचान की गई है। इन हिस्सों में मवेशी अक्सर सड़क पर आ जाते हैं। एनएचएई ने कहा कि इसकी आगे की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।
अदालत ने पूछा कि एनएचएई खुद इन संवेदनशील रास्तों की घेराबंदी क्यों नहीं कर सकता। सड़क पर मवेशियों के आने से रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे। कोर्ट ने इस मामले में ठोस समाधान की तलाश जारी रखी है।
कई राज्यों ने नहीं दाखिल किया जवाब
एमिकस क्यूरीगौरव अग्रवाल ने अदालत को सूचित किया कि पशु कल्याण बोर्ड ने नवंबर 2025 में एसओपी जारी की है। इसके बावजूद कई राज्यों ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों का नाम इस सूची में शामिल है।
राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों द्वारा सहयोग न किए जाने की बात भी सामने आई। एमिकस क्यूरी ने बताया कि आवारा पशुओं को रखने के लिए बुनियादी ढांचे की भारी कमी है। नसबंदी केंद्रों के लिए मैनपावर की भी कमी है।
सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ वकील की दलील
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहताने कहा कि अगर आवासीय समिति का बहुमत कुत्तों को हटाना चाहता है तो उसकी इच्छा का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कुछ लोगों की इच्छा मानी जाएगी तो कोई भी समिति में भैंस रखने की मांग कर सकता है।
वरिष्ठ वकील कपिल सिबल ने पशु प्रेमियों का पक्ष रखा। अदालत ने उनसे पूछा कि वह कुत्तों की बात कर रहे हैं लेकिन मुर्गियों और बकरियों के बारे में क्या। इस पर सिबल ने जवाब दिया कि इसी वजह से उन्होंने मुर्गियां खाना छोड़ दिया है।
याचिकाकर्ता वंदना जैन ने रखे सुझाव
याचिकाकर्तावंदना जैन ने कहा कि वह कुत्तों से प्यार करती हैं लेकिन इंसानों से भी प्यार करती हैं। उन्होंने कहा कि आवारा कुत्तों की सही संख्या का कोई डेटा ही नहीं है। आम लोगों में कुत्तों के व्यवहार को लेकर जागरूकता की भारी कमी है।
उन्होंने अदालत के सामने कुछ सुझाव रखे। ज्यादा जन जागरूकता अभियान चलाए जाएं। विदेशी और महंगे कुत्तों पर लग्जरी टैक्स लगाया जाए। किसानों को खेतों की सुरक्षा के लिए कुत्ते रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
कुत्तों को मारना हल नहीं है
कपिल सिबल नेअदालत में कहा कि कुत्तों को मारना इस समस्या का हल नहीं है। उन्हें पकड़कर नसबंदी करनी चाहिए। टीका लगाकर वापस छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह एक कारगर मॉडल है और कई जगह यह तरीका कामयाब रहा है।
अदालत ने कहा कि समस्या सिर्फ काटने तक सीमित नहीं है। कुत्ते वाहनों के पीछे दौड़ते हैं जिससे दुर्घटनाएं हो सकती हैं। अदालत ने पूछा कि सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में है इसका पता कैसे चलेगा। सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
