National News: सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के प्रबंधन पर दिलचस्प सुनवाई हुई। एडवोकेट सीयू सिंह ने कहा कि कुत्तों को हटाने से चूहों की संख्या बढ़ सकती है। इस पर न्यायाधीश ने पूछा कि क्या बिल्लियां ले आएं। अदालत ने एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों के सही क्रियान्वयन पर जोर दिया।
एडवोकेट सीयू सिंह ने आवारा कुत्तों के पक्ष में दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि भारी संख्या में कुत्तों को एक शेल्टर में रखने से बीमारियां फैल सकती हैं। इसके लिए उन्होंने 91,800 नए शेल्टर बनाने का सुझाव दिया। उनका कहना था कि यह समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
वकीलों ने पेश की ये दलीलें
सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने अदालत को बताया कि आखिरी बार कुत्तों की गिनती 2009 में हुई थी। तब दिल्ली में सिर्फ 5,60,000 कुत्ते थे। अब इनकी संख्या काफी बढ़ चुकी है। इसलिए नई मॉनिटरिंग करना बेहद जरूरी है।
एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील नकुल दीवान ने दलील दी। उन्होंने बताया कि उनका एनजीओ 45 लोगों के साथ काम करता है। इस टीम ने 66,000 से ज्यादा कुत्तों की जान बचाई है। उन्होंने 15,000 कुत्तों की नसबंदी भी करवाई है।
एडवोकेट सीयू सिंह ने एक और दिलचस्प बात कही। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में बंदरों की समस्या भी है। अगर कुत्तों को हटा लिया गया तो बंदरों की संख्या बढ़ सकती है। इसके गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
अदालत ने दिया यह जवाब
अदालत ने वकीलों की दलीलों पर प्रतिक्रिया दी। न्यायाधीशों ने पूछा कि क्या इसका आवारा कुत्तों को हटाने से कोई संबंध है। उन्होंने कहा कि कुत्ते और बिल्ली की दुश्मनी जगजाहिर है। बिल्ली चूहों को मारती है।
अदालत ने आगे कहा कि क्या हमें बिल्लियों की संख्या बढ़ाकर कुत्तों की तादाद कम कर देनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एबीसी नियमों को सही तरीके से लागू करने की जरूरत है। यही स्थायी समाधान हो सकता है।
इस सुनवाई ने आवारा जानवरों के प्रबंधन पर गहरी बहस शुरू कर दी है। विशेषज्ञ इकोसिस्टम के संतुलन पर चर्चा कर रहे हैं। हर जानवर का प्रकृति में एक विशेष स्थान होता है। एक को हटाने से दूसरे की संख्या बढ़ सकती है।
क्या है एबीसी नियम?
एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने का तरीका है। इसमें कुत्तों की नसबंदी की जाती है और फिर उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ दिया जाता है। यह उनके प्रति क्रूरता रोकता है।
इन नियमों का पालन देशभर में अलग-अलग तरीके से हो रहा है। कई शहरों में स्थानीय निकाय इन्हें लागू करने में विफल रहे हैं। इससे आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
नसबंदी के बाद कुत्तों को वापस छोड़ना भी जरूरी है। इससे उस इलाके में नए कुत्तों के आने का खतरा कम हो जाता है। नसबंदी किए गए कुत्ते उस क्षेत्र को अपना टेरिटरी समझते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दे सकती है। अदालत का फैसला देशभर के स्थानीय निकायों के लिए दिशा निर्देश बनेगा। इससे एक समान नीति बनाने में मदद मिलेगी।
मामले की अगली सुनवाई जल्द ही होगी। तब तक सभी पक्ष अपनी दलीलें तैयार कर रहे हैं। अदालत ने सभी से विस्तृत जानकारी मांगी है। इससे पूरे मामले को बेहतर समझने में मदद मिलेगी।
