तीसरी दुनिया के देश गरीब देशों को कटघरे में कर रहे खड़े, जाने क्यों है जलवायु परिवर्तन समस्या का समाधान जरूरी

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दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की वजह से कैसी समस्याएं खड़ी हो रही हैं, इसके क्या कारण हैं, इसमें किसकी कितनी भूमिका है और इसका खमियाजा किसे उठाना पड़ रहा है, ये सब जगजाहिर तथ्य रहे हैं। लेकिन सालों से इस पर चिंता जताए जाने के बीच होते आ रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शायद ही कभी विकसित देशों ने समस्या के गहराते जाने में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने का साहस दिखाया।

इसके उलट जलवायु परिवर्तन या बढ़ते तापमान में कार्बन उत्सर्जन को मुख्य कारण बता कर विकासशील और गरीब देशों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें जरूर की गईं। जबकि तीसरी दुनिया के देश दरअसल इस समस्या में विकसित देशों की सुविधाओं के पीड़ित रहे।

अनेक मौकों पर भारत सहित दुनिया के कई देशों ने इस पहलू पर विकसित देशों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, मगर ऐसे सवालों की आमतौर पर अनदेखी की जाती रही। समर्थ देशों की ओर से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और आरोप दूसरों पर मढ़ने की यह प्रवृत्ति इस समस्या के वास्तविक और दीर्घकालिक नतीजे देने वाले समाधान का रास्ता तैयार नहीं कर सकती थी।

जाहिर है, तीसरी दुनिया के देश यह सोचने पर मजबूर हुए कि अगर वे कार्बन उत्सर्जन की समस्या के भुक्तभोगी हैं तो इसके प्रमुख जिम्मेदार देशों को अपने रवैए पर पुनर्विचार करना होगा। शायद विकासशील देशों के इसी रुख से उपजे दबाव का यह हासिल है कि इस बार मिस्र के शर्म अल शेख में रविवार को संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में ‘हानि एवं क्षति’ समझौते पर सहमति का ऐतिहासिक फैसला सामने आया।

इस समझौते के तहत विकसित देशों के कार्बन प्रदूषण से पैदा हुई मौसम संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों से प्रभावित गरीब देशों को मुआवजा देने के लिए एक कोष तैयार किया जाएगा। हालांकि इस ‘सीओपी 27’ में उम्मीद की जा रही थी कि तेल और गैस सहित सभी तरह के जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किए जाने की बात को भी समझौते में शामिल किया जाए। लेकिन इस पहलू पर ‘सीओपी 26’ में बनी सहमति की तुलना में बहुत कम प्रगति हो पाई। गौरतलब है कि तेल और गैस सहित सभी जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को धीरे-धीरे खत्म करने का प्रस्ताव भारत ने दिया था और यूरोपीय संघ सहित अमेरिका और कई विकसित एवं विकासशील देशों ने इसे समर्थन दिया था।

यह तथ्य है कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है और भारत सहित पूरे विश्व का मकसद वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है। यों कार्बन उत्सर्जन में अपनी सीमित भूमिका होने के बावजूद इसे रोकने के लिए भारत अपनी ओर से हर स्तर पर काम कर रहा है, लेकिन इस मामले में विकसित देशों में अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति आम रही है।

अक्सर होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में ये द्वंद्व सामने भी आते रहे हैं। लेकिन पिछले सम्मेलन के मुकाबले इस बार एक अहम बात यह रही कि इसमें नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर ज्यादा सख्त भाषा दिखी और ऊर्जा माध्यमों में नए प्रयोग के साथ-साथ न्यायोचित बदलाव के सिद्धांतों को शामिल किया गया। गौरतलब है कि नुकसान और मुआवजे के हल के लिए वित्तपोषण या एक नया कोष बनाने की मांग भारत के साथ-साथ कई विकासशील देश लंबे समय से कर रहे थे, मगर धनी देशों ने इस पर बात करना जरूरी नहीं समझा था। 

खासतौर पर जलवायु परिवर्तन के चलते भारी नुकसान के लिए जवाबदेही से बचने के लिए अमेरिका ने ऐसे कोष का विरोध ही किया था। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन में मुआवजे पर बनी सहमति को गरीब देशों की जीत के तौर पर देखा जा सकता है।

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