भारत के इस गांव में कांटों के बिस्तर पर सोते है लोग, सदियों ने निभाई का रही रस्म, जाने क्या है वजह

0
9

भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और सैकड़ों साल पुरानी तमाम परंपराओं को छोड़ने लगे हों, लेकिन आज भी दुनिया के कई ऐसे स्थान है जहां आज भी लोग सदियों पुरानी परंपराओं को निभाते आ रहे हैं.

दरअसल, ये लोग सत्य की परीक्षा के लिए कांटों के बिस्तर पर लेटते हैं. हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के बैतूल में रहने वाले रज्जढ समुदाय के बारे में. जहां के लोग अपने आप को पांडवों का वंशज मानते हैं. इसीलिए पांडवो के ये वंशज हर साल अगहन मास यानी नवंबर दिसंबर के महीने में जश्न मानते है इस दौरान वह दुःख जताते है और कांटों के बिस्तर पर लेटते हैं.

कांटों से बनाया जाता है बिस्तर

इस अनोखी परंपरा को निभाने के लिए गांव में एक स्थान पर कांटों का बिस्तर बनाया जाता है. ये कांटों का बिस्तर इनके लिए सेज के समान होता है. बेरी के कंटीली झाड़ियों से बने बिस्तर पर पांडवों के ये वंशज आसानी से लेट जाते हैं. इस समुदाय के नए युवा भी अपने बुजुर्गों की इस परंपरा को निभाते हुए फक्र महसूस करते है. उनकी मानें तो कांटे होते तो बहुत नुकीले है लेकिन उन्हें इनके कंटीले होने का अहसास नहीं होता और न ही इन पर लौटने से कोई तकलीफ होती.

सदियों से निभाई जा रही है ये परंपरा

बता दें कि बैतूल के सेहरा गांव में रहने वाले रज्जढ में सदियों से कांटो पर लोटने की परंपरा निभाई जा रही है. इस समुदाय के लोगों का मानना है कि पांडवों के वनगमन के दौरान एक घटना हुई थी, जिसके मुताबिक, एक बियाबान जंगल में पांडवों को प्यास ने कुछ ऐसे घेरा की महाबली भाइयो की जान पर बन आई. सभी का गला प्यास से सूखने लगा. हलक में कांटे चुभने लगे, लेकिन एक कतरा पानी भी उन्हें न मिला. पानी की तलाश में भटकते पांडव परेशान हो चुके थे. ऐसे में उनकी मुलाकात एक नाहल समुदाय से हुई. नाहल समुदाय के लोग जंगलों में भिलवा इकठ्ठा कर उससे तेल निकालने का काम किया करते थे.

पानी के लिए पांडवों को करनी पड़ी बहन की शादी

प्यास से परेशान पांडवों ने नाहल से पानी की मांग की, तो नाहल ने उनके सामने ऐसी शर्त रख दी जिसकी हिम्मत कोई नहीं कर सकता था. नाहल ने पानी के बदले पांडवों की बहन जिसे रज्जढ भोंदई बाई के नाम से पुकारते हैं का हाथ मांग लिया. रज्जढ़ो की मानें तो पानी के लिए पांडवों ने अपनी बहन भोंदई की नाहल के साथ शादी कर दी. उसके बाद ही उन्हें पानी मिल पाया.

इस समुदाय के लोग खुद को मानते है पांडवों का वंशज

ऐसा कहा जाता है कि अगहन मास में पूरे पांच दिन रज्जढ इसी वाकये को याद कर गम और खुशी में डूबा रहा. वे खुद को पांडवों का वंशज मानकर खुश होते है तो इस गम में दुखी होते है की उन्हें अपनी बहन को नाहल के साथ विदा करना पड़ेगा.

इस परंपरा को निभाने के लिए गांव में शाम के वक्त लोग इकट्ठे होते हैं और बेरी की कंटीली झाडियां इकट्ठी कर उन्हें एक मंदिर के सामने लेकर आते हैं. यहां झाड़ियो को बिस्तर की तरह बिछाया जाता है और फिर उस पर हल्दी के घोल का पानी सींच दिया जाता है. इसके बाद सभी रज्जढ नंगे बदन इन कांटों से बने बिस्तर पर लेट जाते हैं. साथ ही इस बिस्तर पर ये लोग गोल-गोल घूमते हैं.

समाचार पर आपकी राय: