जय भीम का नारा सबसे पहले किसने दिया, कैसे हुई शुरुआत?

पिछले कुछ समय से एक तमिल फ़िल्म ‘जय भीम’ की हर जगह चर्चा हो रही है. तमिल फ़िल्मों के सुपरस्टार सूर्या की यह फ़िल्म न्याय के लिए एक आदिवासी दलित महिला के संघर्ष को दर्शाती है.

बीबीसी। महाराष्ट्र में आंबेडकर आंदोलन के लाखों कार्यकर्ता और आंबेडकर के साथ भावनात्मक बंधन रखने वाले एक दूसरे से मिलते वक्त ‘जय भीम’ कहते हैं. महाराष्ट्र के कोने-कोने में ‘जय भीम’ शब्द पर हज़ारों नहीं बल्कि लाखों गीत गाए जाते हैं. हालांकि तमिलनाडु में यह एक शब्द फ़िलहाल लोगों को दीवाना बना रहा है.

डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर का मूल नाम भीमराव रामजी आंबेडकर था. आंबेडकर आंदोलन के लिए प्रतिबद्ध लोग उनके सम्मान में उन्हें ‘जय भीम’ कहते हैं. जय भीम केवल अभिवादन का शब्द नहीं है बल्कि आज यह आंबेडकर आंदोलन का नारा बन गया है. आंबेडकरवादी आंदोलन के कार्यकर्ता इस शब्द को आंदोलन की संजीवनी कहते हैं.

अभिवादन और सम्मान का शब्द कैसे क्रांति का प्रतीक बना, इसका सफ़र भी दिलचस्प है. यह नारा कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे पूरे भारत में फैल गया.

‘जय भीम’ का नारा किसने दिया?

‘जय भीम’ का नारा सबसे पहले आंबेडकर आंदोलन के एक कार्यकर्ता बाबू हरदास एलएन (लक्ष्मण नागराले) ने 1935 में दिया था. बाबू हरदास सेंट्रल प्रोविंस-बरार परिषद के विधायक थे और बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों का पालन करने वाले एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता थे.

नासिक के कालाराम मंदिर में लड़ाई, चावदार झील के सत्याग्रह के कारण डॉ. आंबेडकर का नाम हर घर में पहुंच चुका था. इसके बाद महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर ने जिन दलित नेताओं को आगे बढ़ाया, बाबू हरदास उनमें एक थे. रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स में दर्ज है कि बाबू हरदास ने सबसे पहले ‘जय भीम’ का नारा दिया था.

गुंडागर्दी करने वाले असामाजिक लोगों को नियंत्रण में लाने और समानता के विचारों को हर गाँव में फैलाने के लिए आंबेडकर ने समता सैनिक दल की स्थापना की थी. बाबू हरदास समता सैनिक दल के सचिव थे.

‘जय भीम’ का नारा अस्तित्व में कैसे आया, इस सवाल के जवाब में दलित पैंथर के सह-संस्थापक जेवी पवार कहते हैं, ”बाबू हरदास ने कमाठी और नागपुर क्षेत्र से कार्यकर्ताओं का एक संगठन बनाया था. उन्होंने इस बल के स्वयंसेवकों को नमस्कार, राम राम, या जौहर मायाबाप की जगह ‘जय भीम’ कह कर एक-दूसरे का अभिवादन करने और जवाब देने के लिए कहा था.”

पवार बताते हैं, “उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि जय भीम के जवाब में ‘बाल भीम’ कहा जाना चाहिए, जैसे मुसलमान ‘सलाम वालेकुम’ का जवाब देते समय ‘वलेकुम सलाम’ कहते हैं. उनका बनाया रास्ता आदर्श बन गया. “

पवार ने राजा ढाले, नामदेव ढसाल के साथ काम किया है और दलित पैंथर पर उनकी किताब भी प्रकाशित है.

उन्होंने यह भी कहा, “1938 में, औरंगाबाद ज़िले के कन्नड़ तालुका के मकरानपुर में आंबेडकर आंदोलन के कार्यकर्ता, भाऊसाहेब मोरे द्वारा एक बैठक आयोजित की गई थी. इस बैठक में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर भी उपस्थित थे. बाबू हरदास ने यह नारा दिया था जबकि भाऊसाहेब मोरे ने इस नारे का समर्थन किया था.”

जब बाबासाहेब को सीधे जय भीम कहा जाता था

आंबेडकर के जीवनकाल में ही ‘जय भीम’ का अभिवादन शुरू हुआ. आंदोलन के कार्यकर्ता एक-दूसरे को ‘जय भीम’ कहते थे. महाराष्ट्र के पूर्व न्यायाधीश सुरेश घोरपोड़े के मुताबिक एक कार्यकर्ता ने आंबेडकर को सीधे ‘जय भीम’ कहकर संबोधित किया था.

सुरेश घोरपड़े सत्र न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और विदर्भ में दलित आंदोलन के विद्वान हैं. उन्होंने अब तक बाबू हरदास के कार्यों पर लिखा और उन पर व्याख्यान दिया है.

वह बताते हैं, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा पूरे महाराष्ट्र में दलितों के उत्थान के लिए शुरू किए गए आंदोलन में कई युवाओं ने स्वतःस्फूर्त भाग लिया. उनमें से एक बाबू हरदास एलएन थे.”

जय भीम का नारा देने वाले बाबू हरदास एलएन

सुरेश घोरपोड़े ने बताया, “बाबू हरदास किशोरावस्था से ही सामाजिक कार्यों में रुचि रखते थे. उनका जन्म 1904 में हुआ था और 1920 में सामाजिक आंदोलन में शामिल हो गए. उन्होंने नागपुर के पटवर्धन हाई स्कूल से मैट्रिक तक की पढ़ाई की.

“उन्हें ‘जय भीम प्रवर्तक’ के नाम से जाना जाता है. आंबेडकर से प्रेरित होकर बाबू हरदास ने 1924 में कमाठी में संत चोखमेला छात्रावास की स्थापना की. इसने ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को आवास प्रदान किया. उन्होंने मेहनत मज़दूरी करने वाले छात्रों के लिए रात्रिकालीन स्कूल भी शुरू किए. उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया.

“उन्होंने 1925 में बीड़ी वर्कर्स यूनियन की स्थापना की. विदर्भ के दलित और आदिवासी समुदायों के लोग तेंदूपत्ता इकट्ठा करते थे, बीड़ी कारखानों में काम करते थे और साथ ही घर-घर में बीड़ी बनाते थे. बीड़ी निर्माता और ठेकेदार मज़दूरों का शोषण कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था कि जिसका जो हक है वो पैसा उन्हें दो.”

बीड़ी मजदूर संघ का कार्य केवल विदर्भ तक ही सीमित नहीं रहा. रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक ‘दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स, 1857-1956’ में ज़िक्र है कि उन्होंने 1930 में मध्य प्रदेश बीड़ी मजदूर संघ की स्थापना की.

घोरपोड़े ने बताया, “डिप्रेस्ड क्लास मिशन का दूसरा सत्र 1932 में कमाठी में आयोजित किया गया था. बाबू हरदास स्वागत समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का भव्य स्वागत किया.”

वसंत मून की पुस्तक ‘बस्ती’ में उल्लेख है कि 1927 में उन्होंने ‘महारथ’ नामक एक पुस्तिका की शुरुआत की थी. इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है. गेल ओमवेट ने बस्ती का अनुवाद ‘अछूत के रूप में बढ़ना’ के तौर पर किया.

आंबेडकर ने कहा– मेरा दाहिना हाथ चला गया

वसंत मून ने लिखा है, “बाबू हरदास कवि और लेखक थे.”

वो लिखते हैं कि 1937 के विधानसभा चुनाव के लिए आंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने हरदास को उम्मीदवार बनाया था. एक धनी व्यक्ति उनके विरुद्ध खड़ा हो गया. इस व्यक्ति को वसंत मून ने ‘लाला’ कहा है.

एक कार्यकर्ता ने हरदास से संपर्क किया और उनसे अपनी उम्मीदवारी वापस लेने को कहा. उन्होंने इसके लिए पैसों की पेशकश की गई लेकिन हरदास ने इससे इनकार कर दिया.

उन्होंने लिखा, “मैं आंबेडकर के पक्ष में खड़ा हूं. हमने कभी भीख मांगना नहीं छोड़ा. अब हमें हमारा हक मिलेगा.”

वसंत मून की पुस्तक में यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. लालाओं ने तब बब्बू उस्ताद नामक एक भारी भरकम पहलवान को बाबू हरदास के पास भेजा. उन्होंने बाबू हरदास से कहा, “सेठजी ने आपकी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए दस हज़ार रुपये भेजे हैं. यदि आप इसे नहीं लेते हैं, तो वे आपको मार देंगे.”

इस पर हरदास ने कहा, “मैं जानता हूं कि अगर मेरे साथ कुछ बुरा हो गया तो वे नहीं बचेंगे. इस पर बब्बू उस्ताद ने कहा कि यह अगली बात होगी लेकिन तुम्हारे मरने के बाद इसका क्या फ़ायदा.’ हरदास इससे भी पीछे नहीं हटे. ‘आगे देखते हैं कि क्या होता है.” इतना कहकर बब्बू उस्ताद चले गए.

सेठ के पैसे और ताक़त के बावजूद बाबू हरदास चुनाव जीत गए और सेंट्रल प्रोविंस-बरार की परिषद में सदस्य बने. 1939 में तपेदिक से उनकी मृत्यु हो गई. उनके अंतिम संस्कार में दलितों और मज़दूरों की भीड़ जमा हो गई थी. कमाठी और नागपुर क्षेत्र से दलित आए थे. साथ ही भंडारा और चंद्रपुर क्षेत्र के बीड़ी मजदूर भी अंतिम दर्शन देने कमाठी आए.

रिटायर्ड जस्टिस घोरपोड़े कहते हैं, “उनकी मृत्यु के बाद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ‘मेरा दाहिना हाथ चला गया.'”

कमाठी में करहन नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया और कमाठी में ही उनका स्मारक बनाया गया है. मून ने लिखा है, “हरदास एक धूमकेतु की तरह आकाश में चमक रहे थे, उनकी रोशनी से दूसरों को रास्ता मिल रहा था लेकिन यह एक पल में वे ग़ायब हो गए.”

सुबोध नागदेव की मराठी फिल्म ‘बोले इंडिया जय भीम’ भी बाबू हरदास के जीवन पर आधारित है.

‘जय भीम’ क्यों कहा जाता है?

लेखक नरेंद्र जाधव बताते हैं, “बाबासाहेब आंबेडकर का नाम भीमराव रामजी आंबेडकर था. उनके नाम को संक्षिप्त रूप में जपने की प्रथा शुरू में महाराष्ट्र में आम थी और धीरे-धीरे इसे पूरे भारत में जय भीम कहा जाने लगा.”

डॉ. जाधव ने ‘आंबेडकर- अवेकनिंग इंडियाज सोशल कॉन्शियसनेस’ नामक पुस्तक लिखी है. इस पुस्तक को ‘आंबेडकर का वैचारिक चरित्र’ कहा जाता है.

वो कहते हैं, ”जय भीम का नारा बाबू हरदास ने दिया था. यह सभी दलितों के लिए किसी जीत से कम नहीं है. उन्होंने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के आत्मसम्मान को जगाया, उन्हें मनुष्य के रूप में जीने का अधिकार और मार्ग दिया.”

‘जय भीम है समग्र पहचान’

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक उत्तम कांबले ने कहा है कि ‘जय भीम’ का नारा एक पहचान बन गया है.

उत्तम कांबले कहते हैं, “जय भीम सिर्फ अभिवादन नहीं है, यह एक समग्र पहचान बन गया है. इस पहचान के विभिन्न स्तर हैं. ‘जय भीम’ संघर्ष का प्रतीक बना, यह एक सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ एक राजनीतिक पहचान भी बन गया है. मुझे लगता है कि यह क्रांति की समग्र पहचान बन चुका है.

“इसके साथ ही ‘जय भीम’ आंदोलन का भी प्रतीक बन गया है. यदि आप सूर्या की फिल्म देखते हैं, तो आप देखेंगे कि ‘जय भीम’ शब्द का प्रयोग सीधे तौर पर नहीं किया गया है. बल्कि जय भीम को क्रांति के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.”

वहीं वरिष्ठ पत्रकार मधु कांबले को ‘जय भीम’ शब्द आंबेडकर आंदोलन में तत्परता का प्रतीक लगता है.

मधु कांबले ने कहा, “‘जय भीम’ कहना सिर्फ नमस्कार, नमस्ते की तरह नहीं है, यह आसान नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि वह आंबेडकरवादी विचारधारा के करीब हैं. यह शब्द बताता है कि जहां भी लड़ने की ज़रूरत होगी मैं लड़ने के लिए तैयार हूं.”

महाराष्ट्र के बाहर ‘जय भीम’ बोलना कब शुरू हुआ?

‘जय भीम’ का नारा हिंदी भाषी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में आसानी से सुना जा सकता है.

आंबेडकर के विचार पंजाब में भी फैले हुए हैं. इस जगह न केवल नारे गाए जाते हैं बल्कि लोकप्रिय गायिका गिन्नी माही ने भी नौ बार साड़ी बदलकर ‘जय भीम-जय भीम, बोलो जय भीम’ गाया है.

उत्तर प्रदेश में युवा दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने संगठन का नाम ‘भीम आर्मी’ रखा है. जब दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ तो मुस्लिम समुदाय के प्रदर्शनकारियों ने डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें लहराईं. यह संकेत है कि ‘जय भीम’ का नारा किसी एक समुदाय और भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है.

यह पूछे जाने पर कि यह परिवर्तन कैसे हुआ, डॉ. नरेंद्र जाधव कहते हैं, “जैसे-जैसे बाबासाहेब का महत्व और विचारों का प्रसार बढ़ता गया, यह नारा सर्वव्यापी होता गया. मंडल आयोग के बाद देश में वैचारिक उथल-पुथल मच गई. न केवल दलितों में बल्कि अन्य उपेक्षित जातियों में भी चेतना पैदा हुई.”

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