एससी-एसटी एक्ट 2020 क्या है और क्या है खास प्रावधान

एससी/एसटी एक्ट 2020 क्या है

आपको बता दें कि अनुसूचित जाति (Schedule Caste) और अनुसूचित जनजाति (Schedule Tribe) के लिये बहुत तरह के  सामाजिक आर्थिक बदलावों के बावजूद भी सिविल अधिकार कानून 1955 व भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 के प्रावधान इस वर्ग के लोगों की समस्याओं को सही तरीके से संबोधित नहीं कर पा रहे थे, इसको देखते हुए संसद ने वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किये जाने पर 30 जनवरी 1990 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू कर दिया गया था।

यह अधिनियम इस बात का प्रावधान करता है कि जब भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अतिरिक्त कोई व्यक्ति किसी भी तरह से किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंध रखने वाले किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करेगा, तो उसके विरुद्ध यह कानूनी कार्यवाही की जाएगी।

एससी/एसटी एक्ट कब लगता है

कभी भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अतिरिक्त कोई व्यक्ति किसी भी तरह से किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंध रखने वाले किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करेगा, तो उसके विरुद्ध यह कानूनी कार्यवाही की जाएगी।

भारत सरकार ने दलितों पर होने वालें विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को रोकनें के लिए भारतीय संविधान की अनुच्छेद 17 के आलोक में यह विधान पारित किया। दलितों पर अत्याचार के विरूद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया गया हैं। इस अधिनिमय के अन्तर्गत आने वालें अपराध संज्ञेय, गैर जमानती और समझौता योग्य नहीं होते हैं।”

एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018

एक मामले में, SC ने कहा कि –

“सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की जगह शुरुआती जांच की बात कही थी। जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा था कि सात दिनों के भीतर शुरुआती जांच ज़रूर पूरी हो जानी चाहिए।“

सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2018 को सुभाष काशीनाथ बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में निर्णय देते हुए यह प्रावधान किया कि–

“एससी/एसटी कानून के मामलों की जाँच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी द्वारा की जाएगी। पहले यह कार्य इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी करता था। यदि किसी आम आदमी पर एससी-एसटी कानून के अंतर्गत केस दर्ज होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी बल्कि इसके लिये जिले के SP या SSP से अनुमति लेनी होगी।”

किसी व्यक्ति पर केस दर्ज होने के बाद उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है। अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार दंडाधिकारी के पास होगा। अभी तक अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी तथा जमानत भी उच्च न्यायालय द्वारा दी जाती थी।

किसी भी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी पर केस दर्ज होने पर उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी, बल्कि उस सरकारी अधिकारी के विभाग से गिरफ्तारी के लिये अनुमति लेनी होगी।

न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया गया है कि यह जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये। जाँच किसी भी सूरत में 7 दिन से अधिक समय तक न चले। इन नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुलिस पर अनुशासनात्मक एवं न्यायालय की अवमानना करने के संदर्भ में कार्यवाई की जाएगी। “

अधिकारों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ‘एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कोई अपराध इसलिए नहीं स्वीकार कर लिया जाएगा कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति का है, बशर्ते यह यह साबित नहीं हो जाए कि आरोपी ने सोच-समझकर शिकायतकर्ता का उत्पीड़न उसकी जाति के कारण ही किया हो।

एससी एसटी एक्ट सहायता राशि कितनी है:

अनुसूचित जाति/जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989  के अनुसार  उत्पीड़ित अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न की घटनाओं  में आर्थिक सहायता विभिन्न चरणों में दिये जाने का प्रावधान है। आपको बता दें कि अनुसूचित जाति के उत्पीड़ित व्यक्ति द्वारा एफ० आई० आर० (FIR) दर्ज करने पर विभाग द्वारा प्रथम चरण में लाभार्थी को त्वरित आर्थिक सहायता पहुचाने का प्राविधान किया गया है, सामान्यता यहाँ अपराध सिद्व होने की स्थिति में उत्पीडित व्यक्ति को रू. 40000/- से रू. 500000/- तक आर्थिक सहायता दिये जाने का प्राविधान है।”

SC St Act 1989 Full Form in Hindi

आइये जानते हैं  SC St Act की फुल फॉर्म क्या होती है इसे यानि SC St Act को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण ) अधिनियम 1989 कहते है, ये RTI Act भारत के सभी नागरिकों पर लागू है।  अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण ) अधिनियम 1989 में 5 अध्याय तथा कुल 23 धाराएं  हैं।

  • एससी/एसटी अधिनियम 1989 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव और अत्याचार को रोकने के लिये संसद द्वारा अधिनियमित का एक अधिनियम है।
  • यह अधिनियम निराशाजनक वास्तविकता को भी संदर्भित करती है क्योंकि कई उपाय करने के बावजूद अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति उच्च जातियों के हाथों विभिन्न अत्याचारों के अधीन हैं।
  • अधिनियम को संविधान के अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) तथा 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) में उल्लिखित संवैधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए अधिनियमित किया गया है, जिसमें सुरक्षा के दोहरे उद्देश्य हैं। यह कमज़ोर समुदायों के सदस्यों के साथ-साथ जाति आधारित अत्याचार के पीड़ितों को राहत और पुनर्वास प्रदान करता है।
  •  अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति संशोधित अधिनियम (2018) में प्रारंभिक जाँच ज़रूरी नहीं है और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के मामलों में FIR दर्ज करने के लिये जाँच अधिकारियों को अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पूर्व मंजूरी की भी आवश्यकता नहीं है।
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