क्या है Habeas Corpus पिटीशन जिसको लेकर चर्चा में है फिल्म ‘जय भीम’, क्यों आपको जरूर जानना चाहिए?

Habeas Corpus Petition used in Jay Bhim Movie: हाल ही में रिलीज हुई दक्षिण भारतीय फिल्म ‘जय भीम’ पर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है. फिल्म, मद्रास हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रु के एडवोकेसी करियर के उस चर्चित मामले पर आधारित है,​ जो उन्होंने वकील रहते हुए कुरवा जनजाति के लोगों को न्याय दिलाने के लिए लड़ा था. हालांकि फिल्म में पीड़ित आदिवासियों को इरुलर जाति का दिखाया गया है.

फिल्म कई मसलों को लेकर चर्चा में है. फिल्म का नाम जय भीम है, लेकिन वकील किरदार वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है. आईजी की भूमिका निभा रहे प्रकाश राज द्वारा भाषा/सच के सवाल पर थप्पड़ मारने के दृश्य पर भी चिल्ल-पों मची. बहरहाल हमारे-आपके काम की जो बात है, वह है इस फिल्म का आधार- हैबियस कॉर्पस पिटीशन.

इस फिल्म में दिखाया गया है कि वामपंथी विचारधारा से प्रभावित एक वकील, पुलिस द्वारा इरुलर जनजाति के आदिवासियों के उत्पीड़न का केस अपने हाथ लेता है और उसे हैबियस कॉर्पस पिटीशन (Habeas Corpus Petition) यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के सहारे न्याय दिलाता है.

यह हैबियस कॉर्पस पिटीशन है क्या? इसका मतलब क्या होता है? इसकी प्रक्रिया क्या है? यह किन परिस्थितियों में आपके या आपके जाननेवालों के काम आ सकता है? कुल मिलाकर इन सब सवालों के बारे में आपको क्यों जानना चाहिए? हमने सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के युवा अधिवक्ता कुमार शानू से इस बारे में जानने की कोशिश की है.

हैबियस कॉर्पस का मतलब क्या होता है?

Habeas corpus एक लैटिन शब्द है, जिसका मतलब है- टू प्रेजेंट ए बॉडी, यानी किसी व्यक्ति को सशरीर/सदेह उपस्थित करना. हैबियस कॉर्पस का शाब्दिक अर्थ शरीर से ही जुड़ा है. कानूनी भाषा में कहें तो कोर्ट के समक्ष किसी व्यक्ति को प्रस्तुत करना. जय भीम फिल्म में पीड़िता के वकील ने पुलिस हिरासत से गायब हुए व्यक्ति को कोर्ट के समक्ष सदेह उपस्थित कराने का आग्रह किया था, जो पुलिस की जिम्मेदारी बनती है. अब आगे हम इस याचिका के बारे में थोड़ा और अच्छे से समझेंगे.

हैबियस कॉर्पस पिटीशन है क्या?

आप यह तो जानते ही हैं कि संविधान में हमें मौलिक अधिकार दिए गए हैं, इंसान होने के नाते हमारे मानवाधिकार भी हैं और हमारे कुछ कानूनी अधिकार भी होते हैं. इन अधिकारों का अगर वायोलेशन होता है तो इसके लिए देश में कानून है, हम कानून की शरण में जा सकते हैं. संविधान के आर्टिकल 21 में हमें राइट टू लाइफ एंड लिबर्टी यानी स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. ऐसे और भी अधिका​रों का हनन हो तो हम कोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं.

अधिवक्ता कुमार शानू बताते हैं कि हैबियस कॉर्पस पिटीशन भी ऐसी ही एक याचिका है. इसे हिंदी में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका कहा जाता है. इसकी अवधारणा अनिवार्य रूप से इंग्लैंड में आई, जहां एक Prerogative Writ को बंदी प्रत्यक्षीकरण के रूप में जाना गया. हैबियस कॉर्पस की तरह और रिट्स यानी याचिकाएं होती हैं. जैसे- वॉरंटो (Quo Warranto Writ), मैंडमस (Mandamus Wirt), प्रोहिबिशन (Prohibition Writ) और सर्टिओरी (Certiorari writ). इन सबके बारे में हम आपको अंत में बताएंगे. पहले हैबियस कॉर्पस को समझते हैं.

कब और किन परिस्थितियों में काम आता है?

सीधे तौर पर इसे ऐसे समझिए कि जब पुलिस पूछताछ के नाम पर या किसी और बात पर.. किसी व्यक्ति केा गैरकानूनी ढंग से ​हिरासत में रखे, कई दिनों तक उसे बंदी बनाए रखे या नजरबंद रखे या फिर कई दिनों/महीनों तक उस व्यक्ति का अता-पता न चल सके तो इन परिस्थितियों में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की जा सकती है. ऐसे समझिए-

🔷 जब किसी को गैरकानूनी ढंग से बंदी बनाया गया हो.
🔷 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश न किया गया हो.

कुमार शानू बताते हैं कि ऐसी गिरफ्तारी या पुलिस हिरासत अवैध है और व्यक्ति को सकुशल घर जाने का अधिकार होगा. गिरफ्तारी की स्थिति में व्यक्ति को कारण बताया जाना, उसके घरवालों को सूचना देना और उसे अपने वकील से बात करने देना लॉ के अनुसार जरूरी है. किसी को कारण बताए ​बिना गिरफ्तार करना, उसे अपने वकील से बात नहीं करने देना, 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर नहीं करना… आर्टिकल 22 का उल्लंघन माना जाता है.

आर्टिकल 32 और 226 देता है अधिकार

अधिवक्ता शानू ने बताया कि जब किसी के मौलिक, संवैधानिक या कानूनी अधिकार का उल्लंघन हो तो वह कोर्ट की शरण में जा सकता है. संविधान में 2 महत्वपूर्ण आर्टिकल हैं. आर्टिकल 32 कहता है कि आपके मौलिक अधिकारों का हनन हो तो आप सुप्रीम कोर्ट की शरण में जा सकते हैं. वहीं आर्टिकल 226 इससे ज्यादा व्यापक और महत्वपूर्ण है, जो कहता है कि कोई व्यक्ति अपने मौलिक, संवैधानिक और कानूनी.. हर तरह अधिकारों का हनन होने पर हाई कोर्ट की शरण में जा सकता है.

प्राइवेट पार्टी के खिलाफ ​भी किया जा सकता है केस

जाहिर-सी बात है कि अगर किसी को पुलिस ने उठाया है, हिरासत में लिया है तो उसकी सुरक्षित घर वापसी भी पुलिस की ही जिम्मेदारी बनती है. हैबियस कॉर्पस पिटीशन सरकार के खिलाफ और किसी प्राइवेट पार्टी के खिलाफ भी किया जा सकता है. जैसे किसी मिल/कारखाने/कंपनी में कोई व्यक्ति काम कर रहा हो और अचानक वहां से गायब हो जाए और घर नहीं पहुंचे तो भी. दोनों ही परिस्थितियों में कोर्ट पुलिस/सरकार या प्राइवेट पार्टी को गायब व्यक्ति को सशरीर प्रस्तुत करने कह सकती है.

कैसे काम करता है रिट, कैसे दायर करें याचिका?

हैबियस कॉर्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट मांग करता है कि पुलिस या कोई सरकारी अधिकारी अरेस्ट किए गए व्यक्ति को कोर्ट में सदेह प्रस्तुत करे और उसे बंदी बनाए जाने के लिए वैध कारण बताए. अक्सर कोर्ट ऐसे मामलों में त्वरित और गंभीरता से सुनवाई करती है. सुनवाई के दौरान बंदी/कैदी और सरकार दोनों इस बारे में सबूत पेश कर सकते हैं कि क्या व्यक्ति को जेल में डालने का कोई कानूनी आधार है.

कुमार शानू बताते हैं कि कोई भी साधारण व्यक्ति सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिख सकता है और हैबियस कॉर्पस के लिए आग्रह कर सकता है. चीफ जस्टिस इस पत्र पर संज्ञान ले सकते हैं. इससे बेहतर चैनलाइज तरीका है कि किसी अधिवक्ता के माध्यम से हैबियस पेटीशन रिट दायर कराई जाए. इन याचिकाओं पर तुरंत सुनवाई शुरू होती है और कोशिश की जाती है जल्दी सुनवाई पूरी हो.

ऐसे मामलों में कोर्ट पुलिस या सरकार को उस व्यक्ति के सशरीर प्रस्तुति का आदेश दे सकती है. ​अगर गिरफ्तारी अवैध हो या उक्त व्यक्ति को अवैध तरीके से कैद कर रखा गया हो तो पुलिस पर सवाल हो सकता है और कार्रवाई हो सकती है. कोर्ट सरकार को पीड़ित को हर्जाना देने का आदेश दे सकती है. जैसा कि जय भीम फिल्म में भी हुआ है.

इमरजेंसी का एक चर्चित और दिलचस्प मामला पढ़िए

इंदिरा गांधी की सरकार में जून 1975 से मार्च 1977 तक इमरजेंसी लगाई गई थी. इस दौरान जबलपुर में मीसा एक्ट के तहत बहुत सारे लोग गिरफ्तार किए गए थे. इस मामले में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब हैबियस कॉर्पस याचिका को लेकर कहा गया कि इमरजेंसी के दौरान आर्टिकल 21 प्रभावशाली नहीं रहता. यानी राइट टू लाइफ एंड लिबर्टी इमरजेंसी के समय प्रभावी नहीं रहता है. सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने यह फैसला दिया था. इस पीठ में शामिल जस्टिस एचआर खन्ना ने विरोध किया था, लेकिन जस्टिस वाई बी चंद्रचूड़ समेत चार अन्य जस्टिस ने 28 अप्रैल 1976 को बहुमत से यह फैसला सुनाया. जस्टिस वाई बी चंद्रचूड़ बाद में चीफ जस्टिस भी बने.

समय का पहिया घूमा. वर्ष था 2017. नौ जजों की संवैधानिक पीठ केएस पुट्टास्वामी केस की सुनवाई कर रही थी. 28 अप्रैल 1976 को फैसला सुनाने वाले जस्टिस वाई बी चंद्रचूड़ के बेटे जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ इस पीठ में शामिल थे. इस पीठ ने 1976 के फैसले को ओवररूल्ड कर दिया. यानी मौलिक अधिकारों के हनन आपात स्थिति में भी आपत्तिजनक (Objectionable) है.

.. जब कोर्ट ने कहा- बिहार में पुलिस राज

बिहार में पटना पुलिस द्वारा एक ट्रक ड्राइवर को गैर कानूनी तरीके से गिरफ्तार करने और 35 दिनों तक हिरासत में रखा था. livelaw की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में 22 दिसंबर 2020 को पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को पीड़ित ड्राइवर को 5 लाख रुपये मुआवजा देने को कहा था. इस आदेश के खिलाफ बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बिहार सरकार पर तल्ख टिप्पणियां की. मौखिक टिप्पणी में कोर्ट ने यहां तक कहा कि बिहार में पूरी तरह पुलिस राज है. कोर्ट ने फटकार लगाई कि यहां क्यों आए, क्या आपको (बिहार सरकार को) 5 लाख रुपये ज्यादा लग रहा है? कोर्ट ने कहा कि किसी आम आदमी की स्वतंत्रता भी किसी वीआईपी व्यक्ति के ही बराबर है.

पीठ ने कहा, “राज्य सरकार को एसएलपी नहीं दायर करना चाहिए था. आपका तर्क केवल ये है कि वह एक चालक है और इसलिए उसके लिए पांच लाख रुपये का मुआवजा काफी अधिक है? जहां आजादी की क्षति का संबंध है, एक निचले तबके का व्यक्ति भी अधिक संसाधन वाले अमीर व्यक्ति के समान ही होता है. हाईकोर्ट द्वारा पांच लाख रुपये का मुआवजा सही है.”

बोनस जानकारी: अन्य रिट्स के बारे में

हमने ऊपर बताया था कि हैबियस कॉर्पस की तरह और भी रिट्स यानी याचिकाएं होती हैं.

🔷 मैंडमस रिट या परमादेश (Mandamus Writ): इसमें कोर्ट संबंधित अधिकारी/गवर्निंग बॉडी/सरकार को आदेश देती है कि वह उस कार्य को करें जो उसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत है.

🔷 प्रोहिबिशन या प्रतिशेध रिट(Prohibition Writ): इसमें कोर्ट न्यायिक संस्था या लोअर कोर्ट को आदेश दे सकती है कि वे अपने क्षेत्राधिकार तक ही सीमित रहे, उससे बाहर निकलकर कार्य न करे.

🔷 सर्टिओरी या उत्प्रेषण रिट (Certiorari Writ) : इसके तहत सुप्रीम कोर्ट निचली अदालतों को अपनी अधिकारिता का उल्लंघन करने से रोकती है. निचली अदालतों में ऐसी सुनवाई को रोकने, निरस्त करने या ऊपरी अदालतों को ट्रांसफर करने का आदेश देती है.

🔷 वॉरंटो (Qua Warranto Writ): यह by what authority/warrant… पर आधारित है. जैसे कि चुनाव में हार के बावजूद जोर जबरदस्ती से पद पर बने हों या फिर अधिकारी के ट्रांसफर के बावजूद नए अधिकारी को प्रभार न दे तो उससे पूछा जाता है कि किस अथॉरिटी के तहत आप ऐसा कर रहे? ऐसे में न्यायसंगत कार्रवाई होती है.

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