आज के दिन 35 साल पहले राष्ट्रपति और गृहमंत्री के सामने प्रधानमंत्री पर चली थी गोलियां

आज 2 अक्टूबर 2021 को हिंदुस्तान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानी बापू की 152वीं जयंती मना रहा है. इस दिन को हिंदुस्तानी, बापू के जन्म-दिवस के रूप में ही यानी गांधी-जयंती के रूप में जानते-पहचानते हैं.

इस मौके पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित तमाम गणमान्य नागरिकों के देश की राजधानी दिल्ली में राजघाट पर स्थित, बापू के समाधि स्थल पर जाने की परिपाटी कालांतर (2 अक्टूबर 1948 हत्या वाले साल से ही) से चली आ रही है. यह तो इस दिन की खासियत की पहली वजह रही जोकि होनी भी चाहिए और सबको पता भी है. आइए आज मैं आपको इस दिन को भूले-भटके ही याद रखने-करने की दूसरी यानी एक और प्रमुख वजह भी बताता-याद दिलाता हूं.

इस दिन को याद रखने के पीछे दूसरी वजह है इसी स्थान पर (राजघाट बापू की समाधि) आज से करीब 35 साल पहले, देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर कातिलाना हमला किया जाना. हमला ठीक इसी जगह पर या कहिए राजघाट परिसर में एकदम गांधी समाधि स्थल के पास ही हुआ था. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर हमला उस दिन एक बार ही नहीं हुआ. चंद मिनट के अंतराल से दो बार प्रधानमंत्री के ऊपर हमला हुआ. दोनो बार के हमले में प्रधानमंत्री के ऊपर गोलियां दागी गईं थीं. पहली गंभीर बात तो यह कि राजघाट जैसी अति सुरक्षित जगह पर देश के प्रधानमंत्री के ऊपर चंद मिनट में दो बार कातिलाना हमला हो गया.

हमला जिसके चश्मीद गवाह राष्ट्रपति-गृहमंत्री थे

इससे भी बड़ी बात थी कि हमला गांधी जयंती वाले दिन राजघाट जैसे संवेदनशील और हर वक्त कड़े सुरक्षा घेरे में रहने वाले स्थान पर किया गया था. तीसरी गंभीर बात जो उस हमले के दौरान निकल कर दुनिया के सामने आई वो और भी चौंकाने वाली थी. वो बात या वजह थी जब प्रधानमंत्री के ऊपर चंद मिनट में दो बार हमला हुआ (गोलियां दागी गईं) तो, उस वक्त उन दिनों देश के राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जैल सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह भी घटनास्थल पर मौजूद थे. मतलब राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के बाद हिंदुस्तान से विशाल लोकतांत्रिक देश का सबसे ‘पॉवरफुल’ मंत्री भी उस घटना का खुद चश्मदीद बने.

कह सकते हैं कि हिंदुस्तान की तीन में से एक सुपर-पावर (प्रधानमंत्री) के ऊपर कातिलाना हमले के दो सबसे मजबूत चश्मदीद गवाह (राष्ट्रपति-गृहमंत्री) थे. प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर 2 अक्टूबर 1986 को जब हमला हुआ, उससे करीब दो साल पहले ही 31 अक्टूबर 1984 को उनकी मां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को, सुरक्षा गार्ड घर के अंदर ही गोली मारकर कत्ल कर चुके थे. उसके बाद देश भर में भड़के सिख विरोधी उपद्रव से भी देश का वातावरण संवेदनशील ही बना हुआ था. खुद की सुरक्षा को लेकर खुद प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी एहतियातन फूंक-फूंक कर कदम रखते थे. जिन दिनों प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर वो हमला (राजघाट गांधी समाधि पर) हुआ, उन दिनों तक देश के प्राइम मिनिस्टर की सुरक्षा का जिम्मा हिंदुस्तानी खुफिया एजेंसी (आईबी), एसपीजी और दिल्ली पुलिस के ही कंधों पर था.

सुरक्षा पर सवालिया निशान लगना लाजिमी

उस घटना वाले दिन भी राजघाट पर पत्नी सोनिया गांधी के साथ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के राजघाट पहुंचने से ठीक पहले, दिल्ली पुलिस ने चप्पे-चप्पे को छाना था. प्रधानमंत्री के साथ विशेष सुरक्षा दल (Special Protection Group यानी SPG) की टीम भी चल रही थी. बहरहाल तमाम सुरक्षा इंतजामों की पूर्व गहन पड़ताल होने के बाद और दिल्ली पुलिस के सुरक्षा अधिकारियों से “ओके” का ग्रीन सिगनल मिलने के बाद ही राजघाट पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री पहुंचे थे. इन तमाम इंतजामों के बाद भी एक ही स्थान पर प्रधानमंत्री के ऊपर दो-दो बार गोलियां दाग दिए जाने की घटना ने, देश के खुफिया तंत्र और दिल्ली पुलिस की कार्य-प्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया, जोकि लगना भी लाजिमी था. घटना के समय मौके पर दिल्ली पुलिस के डीसीपी (सिक्योरिटी) पूरन सिंह, एडिश्नल पुलिस कमिश्नर (दिल्ली पुलिस सिक्योरिटी एंड ट्रैफिक) 1965 बैच के आईपीएस अधिकारी गौतम कौल भी मौजूद थे.

IPS अफसर को होना पड़ा था सस्पेंड

उस दिन राजघाट परिसर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर हुए कातिलाना हमले में दिल्ली पुलिस ने खुद को कथित रूप से ही सही मगर लाख बचाने की कोशिश की. इसके बाद भी मगर घटना के बाद बवाल इतना ज्यादा बढ़ा कि, दिल्ली पुलिस के एडिश्नल पुलिस कमिश्नर सिक्योरिटी एंड ट्रैफिक गौतम कौल को सस्पेंड तक होना पड़ा था. उल्लेखनीय है कि सस्पेंड होने वाले आईपीएस अधिकारी गौतम कौल नेहरू-गांधी परिवार का हिस्सा थे.

कई दिन तक पेड़ पर छिपा रहा हमलावर

उस घटना को अंजाम देने वाला युवक करमजीत सिंह मौके पर ही पकड़ लिया गया था. उस घटना को अंजाम देने के लिए आरोपी करमजीत सिंह पहले से ही वहां जाकर छिप गया था. उसने एक पेड़ के ऊपर कई दिन तक शरण लेकर प्रधानमंंत्री पर नाकाम कातिलाना हमला किया था. बाद में उस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो की पंजाब सेल के प्रभारी और सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक शांतनु सेन ने की थी.

अब करीब 86 साल के हो चुके सीबीआई के चर्चित पड़ताली अफसर रहे पूर्व संयुक्त निदेशक और राजघाट परिसर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर हुए उस हमले के जांच अधिकारी शांतनु सेन ने, टीवी9 से विशेष बातचीत के दौरान उस घटना पर काफी कुछ कहा. बकौल शांतनु सेन,”मेरी जांच रिपोर्ट के आधार पर उस मामले में आरोपी करमजीत सिंह को 14 साल की ब-मशक्कत सजा हुई थी. वो पंजाब का रहने वाला था. मिसेज गांधी के मर्डर के बाद देश में मचे बवाल में उसके एक दोस्त की दिल्ली मेंं भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी. इसी से खफा करमजीत सिंह 2 अक्टूबर 1986 को राजघाट परिसर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी को कत्ल करके अपने दोस्त की हत्या का बदला लेने पहुंचा था.”

हमलावर ने पांव में गोली मार की निशाने की प्रैक्टिस

शांतनु सेन आगे कहते हैं,”जब करमजीत गिरफ्तार हुआ तो उसकी उम्र ब-मुश्किल यही कोई 28-30 साल रही होगी. सीबीआई की पूछताछ में करमजीत ने कबूला था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी, उस हमले में किसी भी तरह से जीवित न बचें. इसके लिए उसने पंजाब में एक लड़के के पांव में गोली मारकर, रिवॉल्वर से निशाना साधने की प्रैक्टिस भी की थी. उस सिलसिले में करमजीत के खिलाफ पंजाब पुलिस ने हत्या की कोशिश का एक मुकदमा, प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर हुए हमले से पहले ही कर रखा था.

राजीव गांधी ने चेताया, लेकिन लोगों ने कहा-टायर फटा

उस दिन देश गांधी जी की 117वीं जयंती मना रहा था. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के साथ चल रहे प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा भी था कि, ‘देखिए गोली चली है. मानिए यह गोली चलने की आवाज है.” इसके बाद भी मगर साथ चल रहे कुछ लोगों ने गोलियों की उस आवाज को टायर फटने की बात कहकर नजरंदाज कर दिया.’

“जब वापसी में दोबारा गोली चली तब पहले से ही चौकन्ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने फिर कहा, ‘देखिये मैं कहता हूं यह गोली चलने की आवाज है. यह आवाज टायर फटने की नहीं हो सकती.’ इसके बाद जब छानबीन शुरू हुई तो हमलावर करमजीत सिंह घटनास्थल पर मौजूद एक पेड़ से खुद ही उतर कर मौजूद लोगों के बीच आ गया. घटना के वक्त तब सुरक्षा अमले में आईबी के डिप्टी डायरेक्टर एम. आर. रेड्डी भी मौजूद थे.

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