शांता कुमार की धर्म पत्नी के साथ फोटो

आज लगभग तीन मास बीत गए संतोष को हमको छोड़कर गए हुए, संभलने की कोशिश कर रहा हूं। मन से नहीं, तन से भी संभलना पड़ेगा, मनुष्य के पास स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। आज तीन महीने बाद आपसे फिर से बात करने की हिम्मत जुटा पा रहा हूं’। ये बातें अपने फेसबुक अकाउंट पर शेयर की हैं पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने। शांता कुमार लिखते हैं कि संतोष की याद में आंसुओं से नहीं, मुस्कुराहट से जीवन जीना होगा। 

सभी के साथ ऐसा होता है। होली ही नहीं, जीवन का हर त्योहार हर क्षण अब मुझे संतोष के बिना जीना है, परंतु मेरा परिवार है, मेरा समाज है, आप सब मित्र हैं, सबके सहारे साहस से जीवन जीने का प्रयत्न करूंगा। होली के अवसर पर भावुक होते हुए शांता कुमार ने लिखा है कि होली पर बीते समय की याद आ गई। लगभग 10 वर्ष पहले होली पर पालमपुर में अकेला था, संतोष किसी विशेष कारण से दिल्ली में थी, उसके बिना ऐसी पहले होली थी। होली और दिवाली के दिन सदा घर में ही रहता था, एमर्जेंसी के 19 महीने तो त्योहार जेल में आंसुओं से मनाया था। इसके अतिरिक्त संतोष के बिना त्योहार नहीं मनाया। पहली बार उसके बिना पालमपुर में होली मेरे लिए बहुत बड़ी यातना थी, तब एक कविता लिखी थी, उसे शांता कुमार ने साझा किया है।

शांता कुमार की होली पर लिखी कविता

इस बार की होली
प्रिय तुम्हारे बिन
नहीं होली
बस यूं ही हो३ ली।
खेली होली, पर खिली नहीं
गुलाल की लाली नहीं चटकी
संगीत की धुन थी कहीं भटकी
तुम्हारे बिन प्रिय
सब था फिर भी नहीं था
ना थी वह उमंग ना वह तरंग
इक रस्म सी हो ..ली
इस बार की होली
धौलाधार पर वैसी ही पड़ी थी
सूर्य किरणें चूमती थी
पर्वतों के बाल को ठीक वैसे ही
जैसे तुम्हारे साथ देखी थी
हवा थी पक्षियों की चहचहाहट भी चहकती थी
पर नहीं था वह जो तुम्हारे साथ होता था
नहीं होगी प्रिय
अब कभी ऐसी होली
तुम रहोगी साथ
मेरे पास
हर बार
तभी होगी होली
अगली बार की होली
होगी होली
तुम्हारे साथ की होली
इस बार की होली ।

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