Uttar Pradesh News: समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह के बयान ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। उन्होंने श्रीराम को ‘समाजवादी’ बताया था। इस पर कथावाचक रामभद्राचार्य ने सपा पर सवालों की बौछार कर दी है। उन्होंने अयोध्या में पुरानी घटना याद दिलाते हुए सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव पर निशाना साधा।
रामभद्राचार्य ने एबीपी न्यूज से बातचीत में कई तीखे सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि सपा ने भगवान राम का नाम लिया यह अच्छी बात है। लेकिन उन्हें सपा सांसद से एक सवाल का जवाब चाहिए। अगर राम समाजवादी थे तो मुलायम सिंह यादव ने राम भक्तों पर गोलियां क्यों चलवाईं?
अयोध्या की गोलीबारी को किया याद
तुलसीपीठाधीश्वर ने अयोध्या की 1990 की घटना का जिक्र किया। उस समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कारसेवकों पर पुलिस की फायरिंग में कई लोग मारे गए थे। रामभद्राचार्य ने इसी घटना पर सवाल उठाया।
उन्होंने पूछा कि अगर राम समाजवादी हैं तो उनके भक्तों का खून क्यों बहाया गया। उन्होंने कहा कि अयोध्या उस समय राम भक्तों के खून से रंग गई थी। यह सवाल सपा की विचारधारा और उसके कृत्य के बीच के अंतर को उजागर करता है।
अखिलेश यादव के अयोध्या न जाने पर सवाल
रामभद्राचार्य नेसपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर राम समाजवादी हैं तो अखिलेश यादव अयोध्या क्यों नहीं गए। उन्होंने अभी तक रामलला के दर्शन करने की जहमत क्यों नहीं उठाई।
यह सवाल सपा के नेतृत्व की धार्मिक भावनाओं के प्रति दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। राजनीतिक विश्लेषक अक्सर सपा पर हिंदू मतदाताओं से दूरी बनाने का आरोप लगाते रहे हैं। यह बयान उसी बहस को नया आयाम देता है।
राम को बताया राष्ट्रवादी, परिवारवाद से किया अलग
कथावाचक नेस्पष्ट किया कि भगवान राम मूल रूप से राष्ट्रवादी हैं। वे मानवतावादी भी हैं। उन्होंने कहा कि राम ने कभी परिवारवाद की बात नहीं की थी। उन्होंने कभी परिवारवाद का सहारा नहीं लिया था।
यह टिप्पणी सपा पर लगते परिवारवाद के आरोपों की ओर इशारा करती है। सपा का नेतृत्व यादव परिवार के हाथों में रहा है। मुलायम सिंह यादव के बाद अब अखिलेश यादव पार्टी का नेतृत्व संभाल रहे हैं। इस पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
अखिलेश और राम की तुलना को बताया असंभव
रामभद्राचार्य नेसाफ कहा कि अखिलेश यादव की राम से तुलना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव का राम जैसा बनना संभव ही नहीं है। यह बयान सपा सांसद के बयान के प्रत्युत्तर में आया है।
उन्होंने कहा कि राम वैसे तो सब कुछ हैं। लेकिन उनका मूल स्वरूप राष्ट्रवाद और मानवता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह बहस चुनावी राजनीति में धर्म के इस्तेमाल का नया अध्याय है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं।
भाजपा भी कर चुकी है सपा पर हमला
सपासांसद के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी भी हमलावर हो गई थी। भाजपा नेताओं ने सपा को फिर से हिंदू विरोधी बताने की कोशिश की थी। रामभद्राचार्य के बयान ने इस बहस को और हवा दी है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए यह बहस महत्वपूर्ण है। सपा हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाना चाहती है। भाजपा इस कोशिश को विफल करने में जुटी है। धार्मिक प्रतीकों पर यह विवाद इसी संघर्ष का हिस्सा है।
राममंदिर निर्माण के बाद बदला राजनीतिक समीकरण
अयोध्यामें राममंदिर के निर्माण के बाद राजनीतिक समीकरण बदले हैं। सभी दल अब खुद को राम से जोड़ने की कोशिश में दिखते हैं। सपा सांसद का बयान इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि विपक्षी दलों पर भाजपा और उसके समर्थक लगातार सवाल उठाते रहे हैं। वे पूछते हैं कि जो दल मंदिर आंदोलन के समय मौन रहे या विरोध में थे वे अब राम का नाम क्यों ले रहे हैं। यही सवाल अब रामभद्राचार्य ने उठाया है।
