हिमाचल प्रदेश में हर ओर तानाशाही का आलम नजर आता है। सूचना के अधिकर अधिनियम के तो यहां जैसे मर्जी वैसे धज्जियां उड़ाई जाती है। इस में सबसे खास बात यह है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी सूचना का अधिकार अधिनियम से अलग हिमाचल प्रदेश सूचना का अधिकार अधिनियम यहां चलता है। केंद्र द्वारा जारी सूचना के अधिकार अधिनियम में प्रावधान है कि पहले सूचना तैयार की जाएगी। उसके बाद पेजों की संख्या के आधार पर सूचना का मूल्य मांगा जाएगा। हिमाचल प्रदेश सूचना का अधिकर अधिनियम में भी यही प्रावधान है लेकिन फिर भी कानून को ताक पर रख कर मनमाने तरीकों से सूचना मांगने वालों को डराया जाता है। ताकि कोई सूचना ना ले पाए और सरकारी विभागों के काले कारनामे सामने ना आ सके।

मामला हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला का है। समाजसेवी रवि कुमार(पूर्व प्रत्याशी लोकसभा) ने राज्य सचिवालय से मुख्यमंत्री राहत कोष से हिमाचली बीमार लोगों और कोरोना मरीजों के इलाज के लिए दिए गए अनुदान के बारे जानकारी मांगी। सचिवालय से तुरंत एक पत्र भेज दिया गया। जिसमें लिखा गया है कि कुल पेपरों की संख्या 13500 होगी और 2 रुपये प्रति पेपर के मूल्य के आधार सूचना के 27000 रुपये चुकाने पड़ेंगे। सचिवालय के पत्र में यह भी लिखा गया है कि आवेदनकर्ता कार्यालय में आकर सूचना का निरीक्षण कर सकता है और जो सूचना चाहिए वह ले सकता है। लेकिन यहां भी गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम में निरीक्षण मुफ्त नही है। निरीक्षण के भी पैसे देने पड़ते है।

जब हमारी टीम ने रवि कुमार से बात की तो उनका कहना था कि मुझे इतनी ज्यादा जानकारी नही चाहिए। मुझे बस इतना जानना है कि मुख्यमंत्री राहत कोष से किस किस को और कितना कितना अनुदान दिया गया है। लेकिन हिमाचल प्रदेश सचिवालय मुझे भारी भरकम फीस पर डराने लग गया है। जिससे साफ जाहिर होता है कि मुख्यमंत्री राहत कोष में भारी घोटाला चल रहा है और सचिवालय जानबूझ कर पेपरों की संख्या बढ़ा कर मुझे सूचना नही देना चाहता। इस मामले में रवि कुमार ने राज्य सूचना आयोग को मेल के माध्यम से मांग भेजी है कि अगर यह सभी पेपरों की सूचना देनी जरूरी है तो मुझे सूचना पेन ड्राइव या डीवीडी में दी जाए।

By RIGHT NEWS INDIA

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