घर की जिम्मेवारियों को भी निभाना है, होमगार्ड हूं साहब ड्यूटी पर भी जाना है- रवि ठाकुर

मां बाप की सेवा, बच्चों को स्कूल पढ़ाना है, अकेला नहीं मैं, घर की जिम्मेवारियों को भी निभाना है, होमगार्ड हूं साहब ड्यूटी पर भी जाना है !

वर्दी तो दे दी, अब रोजगार भी दीजिए, कुछ सर पे जिम्मेदारी, कुछ कंधो पे मेरे भार भी दीजिए, मैं सक्षम हूं, मैं रक्षक हूं, फिर क्यूं सिर्फ गृह का ही रक्षक हूं, पिंजरे में ही सही पर कुछ तो अधिकार दीजिए,

मैं शांत हूं, मैं मौन हूं, जो कभी ना चुकता हो सका मैं वो लोन हूं, अरे मिट्टी में मिल गई मेरी 6 दशकों की पीढ़ियां, मुझे आज भी पता नहीं मैं कौन हूं ? कुछ नियम भी हैं, अधिनियम भी हैं, अब बदला इन्हे लगाना है ! होमगार्ड हूं साहब ड्यूटी भी जाना है !

मैं रात हूं, मैं सवेरा हूं, ना अपना हूं, ना तेरा हूं, दिखता हूं सबको उजाले की तरह फिर भी क्यूं मैं अंधेरा हूं !

ना ड्यूटी है, ना सेवा है, मेरी ज़िन्दगी तो बस एक छलेवा है ! कुछ तो कदर रख मेरे 6 दशकों के बलिदान का, आखिर मैं भी हिस्सा हूं भारत की आन, बान और शान का,
संभल जा ए होमगार्ड, अभी तो जंग बाकी है,
जो समझ बैठे हैं मिट्टी तुझे उन्हें क्या पता कि तेरा रंग खाकी है,
रुकने से नहीं मंजिल तो भागने से मिलेगी, उठ जा नींद से कामयाबी तो जागने से मिलेगी, एक शपथ लो कि ये बीड़ा सबको उठाना है, पर ये मत कहना कि मुझे तो बस ड्यूटी जाना है !


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