आस्था है तो एक उंगली से उठ जाता है, मृकुला देवी के मंदिर में रखा 80 किलो का पत्थर

वैज्ञानिक चाहे लाख तर्क दें लेकिन श्रद्धा और विश्वास की बात सामने आती है तो उनका विज्ञान धरा का धरा रह जाता है। हिमालय की गोद मे बसे शीत मरुस्थल लाहुल-स्पीति में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। इस बात पर क्या कोई विश्वास कर सकता है कि 80 किलो का भारी भरकम पत्थर महज एक अंगुली से उठाया जा सकता है, नहीं न लेकिन ऐसा है, जब कभी लाहुल-स्पीति स्थित माता मृकुला के प्रांगण में आएं, इस चमत्कारी पत्थर को उठाने का प्रयास अवश्य करें। हो सकता है कि आप सफल रहें पर यह तभी होगा अगर आप धर्म के मार्ग पर हैं आप के अंदर भक्ति भाव है। लाहुल-स्पीति के उदयपुर स्थित मृकुला माता मंदिर के प्रांगण में आज भी महाभारत कालीन एक पांडु पत्थर है।

इस पत्थर को महज पांच आदमी माध्यम उंगली से माता के जयकारे के साथ स्पर्श मात्र से उठा देते हैं। उपमंडल उदयपुर में स्थित माता मृकुला के दरबार में रखा पत्थर धर्म के मार्ग पर चलने वालों की परीक्षा लेता है। महाभारत के योद्धा व पांडु पुत्र भीम द्वारा रखा गया यह ऐतिहासिक पत्थर आज भी भक्तों को पाप व धर्म का एहसास करवा रहा है।

मान्यता है कि पांडु पुत्र भीम जब अज्ञात वास में लाहुल के उदयपुर में आय तो उन्होंने इस पत्थर को मंदिर के प्रांगण में रखा भीम इस पत्थर के वजन के बराबर एक समय में भोजन ग्रहण करते थे। अज्ञातवास के दौरान माता कुंती जब पांडवों के लिए भोजन पकाती थी तो भीम अपने भाइयों के हिस्से का सारा भोजन खा जाते थे, तब माता कुंती ने इस पत्थर के भार के बराबर भीम को भोजन देती थी। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि उदयपुर में आठवीं सदी के दौरान माता काली का मंदिर हुआ करता था, जिसकी मूर्ति आज भी मृकुला मंदिर में है। इसे काली का खप्पर कहा जाता है तथा यह हर वक्त कपड़े से ढकी रहती है। यह मूर्ति साल में एक बार फागड़ी उत्सव पर निकाली जाती है तथा मंदिर से पुजारी के घर तक ही लाई जाती है। माता के कुल पुरोहित व पुजारी बुजुर्ग ही हीरादास शर्मा व रामलाल का कहना है कि आज भी मंदिर के प्रति घाटी के लोगों की अपार आस्था है। चंबा के राजा उधम सिंह के आने के बाद इस जगह का नाम उदयपुर पड़ा।


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