गुच्छी की कीमतों में 12000 की वृद्धि, दिल की बीमारी के लिए बनती है दवाइयां

कोरोना काल में गुच्छी के दामों ने लंबी छलांग लगाई है। गुच्छी 12 हजार रुपये किलो बिक रही है। देश के पांच सितारा होटलों में गुच्छी की अधिक मांग हो रही है। पिछले साल बाजार में गुच्छी को पांच हजार रुपये प्रति किलो अधिक दाम से ऊपर खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं था। हिमाचल प्रदेश के चंबा, कुल्लू, मंडी, शिमला, किन्नौर के अलावा उत्तराखंड के जंगलों में गुच्छी के अधिक पैदावार होती है। रोहडू में ही गुच्छी का करोड़ों का कारोबार होता है।

मंडी जिले में सराज के जंगलों में गुच्छी की अच्छी पैदावार होती है। गांव की महिलाएं और बच्चे मार्च के बाद जुलाई तक कामकाज छोड़कर जंगलों में गुच्छी निकालते रहते हैं।

पिछले वर्ष ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गुच्छी की पैदावार कम रही थी। हालांकि, बाजार में दाम भी कम थे। पहाड़ों के जंगलों में बर्फ पिघलने के बाद गुच्छी उगनी शुरू हो जाती है। गुच्छी की कीमत बीस हजार प्रतिकिलो से ऊपर ही रहती है।

व्यापारी इसे पहाड़ी क्षेत्रों से बारह पंद्रह हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदते हैं। सब्जी के तौर पर गुच्छी को पौष्टिक आहार भी माना जाता है। हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर से गुच्छी का निर्यात अमेरिका, फ्रांस और इटली के लिए भी होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी गुच्छी के मुरीद रहे हैं। गुच्छी को दिल और अन्य रोगों के लिए रामबाण माना गया है।

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