हिमाचली बागवानों के आढ़तियों के पास फंसे करोड़ों रुपये, चार साल से नही किया जा रहा भुगतान

हिमाचल के बागवानों का प्रदेश की मंडियों में बेचे सेब का करोड़ों रुपये का भुगतान फंसा हुआ है। सेब बेचने के बाद चार साल से बागवानों को इस धनराशि का भुगतान नहीं हो पाया है। सेब सीजन के रफ्तार पकड़ने से पहले ही यह मामला गरमाने लगा है। भुगतान न मिलने से परेशान बागवान सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में आढ़तियों के साथ-साथ लदानियों का पंजीकरण भी भुगतान की सख्त शर्तों के साथ सुनिश्चित किया जाए।

बागवानों के बिके सेब की धनराशि आढ़तियों और बड़े व्यापारियों के पास फंस जाने के मामले नए नहीं है। इन मामलों में एसआईटी भी कार्रवाई करती रही है। शिकायत मिलने पर एसआईटी ने ऐसे कई मामलों को निपटाकर बागवानों को उनकी फंसी राशि का भुगतान दिलाया है।

लेकिन, इसका लाभ उन्हीं बागवानों को मिल पाया है जो शिकायत करने आगे आए थे। बताते हैं कि अधिकांश बागवान निजी संबंधों के कारण शिकायत तक करने से हिचकिचाते हैं। बागवान स्थानीय आढ़ती को विश्वास लेकर अपनी फसल बाहरी राज्यों के लदानियों को बेच देते हैं। इसके बाद लदानी सेब खराब होने की दलील देकर बागवानों की फसलों की भुगतान लटका देते हैं।

कोटखाई के प्रगतिशील बागवान प्रताप चौहान कहते हैं कि उनके क्षेत्र के कई बागवानों को दो लाख से लेकर आठ लाख तक का भुगतान सेब बेचने के बाद नहीं हुआ है। उनकी भी सेब की करीब आठ लाख की राशि फंसी हुई है। हिमाचल प्रदेश फल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान कहते हैं कि स्थानीय आढ़ती होने के कारण बागवान शिकायत करने से परहेज करते हैं। इसी कारण से बागवानों को सेब के बेचने के बाद भुगतान के लिए परेशान होना पड़ता है। सरकार आढ़तियों के साथ ही लदानियों का भी पंजीकरण करके उन पर अपना नियंत्रण सुनिश्चित करे।

आढ़तियों का होता है पंजीकरण
प्रदेश सरकार ने मंडियों में कारोबार कर रहे आढ़तियों का पंजीकरण ही अनिवार्य किया है। अभी तक लदानियों का पंजीकरण करने की कोई व्यवस्था नहीं की है। लिहाजा बागवानों की फसलों की समय पर भुगतान नहीं हो रहा। इस कारण से बागवानों को करोड़ों रुपये के भुगतान का इंतजार है। बागवान सरकार से भी मांग उठा रहे हैं कि बेलगाम आढ़तियों पर भी पंजीकरण के समय नकेल कसी जाए।

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