New Delhi News: भारतीय वायुसेना की ताकत अब कई गुना बढ़ने वाली है। रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह भारत के रक्षा इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा सौदा माना जा रहा है। इस डील की कुल कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये (39 बिलियन डॉलर) है। सबसे खास बात यह है कि ये विमान अब ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत की धरती पर ही बनाए जाएंगे।
राफेल ही क्यों बना पहली पसंद?
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, राफेल को चुनना भारत का एक बड़ा रणनीतिक फैसला है। अमेरिका के F-35 और रूस के Su-57 की रेस में होने के बावजूद भारत ने राफेल पर भरोसा जताया। इसकी वजह यह है कि भारतीय वायुसेना पहले से ही राफेल का इस्तेमाल कर रही है। इससे पायलटों की ट्रेनिंग और मेंटेनेंस का खर्चा बचेगा। साथ ही, फ्रांस ने भारत को तकनीक और ‘सोर्स कोड’ देने में जो लचीलापन दिखाया, वह किसी और देश ने नहीं दिखाया।
टाटा और डसॉल्ट की हैदराबाद में जुगलबंदी
इस ऐतिहासिक डील के तहत सभी विमान विदेश से बनकर नहीं आएंगे। योजना के मुताबिक, 12 से 18 विमान फ्रांस से सीधे ‘रेडी-टू-फ्लाई’ हालत में आएंगे। बाकी बचे 96 विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इसके लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन मिलकर काम करेंगे। हैदराबाद के प्लांट में राफेल के मुख्य हिस्से तैयार होंगे। साल 2028 तक यहां से पहला स्वदेशी ढांचा निकलने की उम्मीद है।
डील की 5 बड़ी बातें जो आपको जाननी चाहिए
- ताकत में भारी इजाफा: वायुसेना के पास अभी 36 राफेल हैं। 114 नए जेट और नेवी के 26 विमान मिलने के बाद भारत के पास कुल 176 राफेल होंगे।
- 60% स्वदेशीकरण: शुरुआत में विमान में 30% भारतीय सामग्री का इस्तेमाल होगा। इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 60% तक ले जाया जाएगा।
- स्क्वाड्रन की कमी होगी दूर: वायुसेना में स्क्वाड्रन की संख्या घटकर 29 रह गई थी। इन विमानों के आने से 6 नई स्क्वाड्रन तैयार होंगी।
- ऑपरेशन सिंदूर का असर: रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में राफेल ने चीनी मिसाइलों को आसानी से मात दी थी। इसने सरकार का भरोसा और बढ़ा दिया।
- फरवरी में अंतिम मुहर: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों फरवरी 2026 में भारत आ सकते हैं। पीएम मोदी के साथ मुलाकात में इस डील पर साइन होंगे।
