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प्रीति पटेल: बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा को लेकर ब्रिटेन सरकार से सवाल

Bangladesh News: ब्रिटेन की सांसद और विदेश मामलों की शैडो सेक्रेटरी प्रीति पटेल ने बांग्लादेश की स्थिति को गंभीर बताया है। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं सहित अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा पर चिंता जाहिर की। पटेल ने ब्रिटेन के विदेश सचिव को लिखे पत्र में तत्काल कार्रवाई का आग्रह किया है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और स्थिरता लाने के लिए ब्रिटेन सरकार से अपना प्रभाव इस्तेमाल करने को कहा है।

प्रीति पटेल ने अपने पत्र में ताजा हिंसा का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि सिर्फ 18 दिनों में कम से कम 6 हिंदुओं की हत्या की खबरें हैं। उन्होंने इस स्तर के उत्पीड़न और हिंसा को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। पटेल ने ब्रिटिश मंत्रियों की पिछली चर्चाओं का भी हवाला दिया। उन्होंने पूछा कि हिंसा बढ़ने पर बांग्लादेशी अधिकारियों से सीधा संपर्क क्या किया गया।

पटेल ने सरकार से कई सीधे सवाल पूछे हैं। उन्होंने पिछले एक साल की निगरानी गतिविधियों के बारे में जानना चाहा। उन्होंने मंत्रियों द्वारा बांग्लादेशी समकक्षों से बातचीत का विवरण मांगा। हिंदू समुदाय की सुरक्षा के लिए दिए गए आश्वासनों की जानकारी चाही। उन्होंने ब्रिटेन में बांग्लादेशी उच्चायुक्त से हुई बातचीत के बारे में भी पूछा।

सांसद ने ब्रिटेन सरकार से क्षेत्रीय भागीदारों के साथ काम करने को कहा। उनका लक्ष्य बांग्लादेश में स्थिरता लाना है। पटेल चाहती हैं कि अल्पसंख्यकों के लिए सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित हो। बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान हिंसा बढ़ी है। इससे दुनिया भर के लोग और मानवाधिकार संगठन चिंतित हैं।

मानवाधिकार रिपोर्ट में गंभीर आंकड़े

ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज ने हिंसा पर नजर रखी है। इस एजेंसी ने पिछले सात महीनों के दौरान सौ से अधिक मौतों का दस्तावेजीकरण किया है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है और एक गंभीर प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। संस्था का कहना है कि यह हिंसा अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक यह एक देशव्यापी पैटर्न है। अल्पसंख्यकों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। 6 जून 2025 से 5 जनवरी 2026 के बीच 116 अल्पसंख्यकों की मौत दर्ज की गई। ये मौतें लिंचिंग, हत्या और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई हैं। पीड़ित बांग्लादेश के सभी आठ डिवीजनों और 45 जिलों से हैं।

यह डेटा साबित करता है कि समस्या व्यापक है। हिंसा का यह दायरा बताता है कि यह कोई स्थानीय मामला नहीं है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि यह लक्षित अत्याचारों की एक श्रृंखला है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर गया है। दबाव बनाने की मांग तेज हो रही है।

प्रीति पटेल का पत्र इसी चिंता को प्रतिबिंबित करता है। वह ब्रिटेन सरकार को अपनी विदेश नीति के जरिए हस्तक्षेप करने को कह रही हैं। उनका मानना है क ब्रिटेन के पास पर्याप्त राजनयिक प्रभाव है। इस प्रभाव का इस्तेमाल स्थिति सुधारने के लिए किया जा सकता है।

बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा लंबे समय से चिंता का विषय रही है। हाल के महीनों में हिंसा की घटनाओं में अचानक वृद्धि देखी गई है। स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार खबरें आ रही हैं। इन खबरों ने वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रिया उत्पन्न की है।

ब्रिटेन सरकार के पास अब इन सवालों का जवाब देना है। प्रीति पटेल की पार्टी विपक्ष में है। इसलिए उनकी भूमिका सरकार से जवाबदेही तय करने की है। उनके पत्र का उद्देश्य सरकार को कार्रवाई के लिए प्रेरित करना है। साथ ही सार्वजनिक बहस को भी बढ़ावा देना है।

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अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया से बांग्लादेश सरकार पर दबाव बन सकता है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि स्थानीय प्रशासन कई बार प्रभावी कार्रवाई नहीं करता। उनका आरोप है कि हिंसा करने वालों को कानून के शिकंजे से बचाया जाता है। इससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है।

सituation जटिल है और इसका कोई आसान समाधान नहीं दिखता। ब्रिटेन जैसे देश अपने राजनयिक चैनलों के माध्यम से बातचीत जारी रख सकते हैं। वे आर्थिक और राजनयिक संबंधों का इस्तेमाल दबाव के तौर पर कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाया जा सकता है।

प्रीति पटेल का यह कदम उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका दिखाता है। वह अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाती रही हैं। बांग्लादेश के संदर्भ में उनकी चिंता व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों है। उनकी पहल से ब्रिटिश संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है।

आने वाले दिनों में ब्रिटेन सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि वह इस मामले को कितनी गंभीरता से लेती है। विदेश सचिव द्वारा दिया गया कोई भी बयान स्थिति को प्रभावित करेगा। बांग्लादेश सरकार भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकती है।

मानवाधिकार निगरानी संगठनों का काम जारी रहेगा। वे हिंसा के नए मामलों को दर्ज करते रहेंगे। उनकी रिपोर्ट्स अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाए रखने का काम करेंगी। स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था सुधारने की जरूरत है। न्याय की प्रक्रिया को मजबूत करना होगा।

धार्मिक स्वतंत्रता एक बुनियादी मानव अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय कानून इसे सुरक्षित करता है। बांग्लादेश सरकार का संवैधानिक दायित्व भी अपने सभी नागरिकों की रक्षा करना है। वैश्विक नजरें अब उनकी कार्रवाई पर टिकी हैं। स्थिति में सुधार की उम्मीद हर तरफ है।

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