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प्रेमानंद जी महाराज: जाने देना ही क्यों है असली शक्ति, जानिए छोड़ने की कला

National News: आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद जी महाराज के विचारों ने एक बार फिर चर्चा बटोरी है। उनका कहना है कि अत्यधिक लगाव ही दुख का मूल है। उन्होंने ‘छोड़ने की कला’ पर गहन प्रकाश डाला है। महाराज जी के अनुसार जो आपका है वह वापस आएगा और जो नहीं है उसे पकड़ना व्यर्थ है। यह दृष्टिकोण आज के तनावपूर्ण जीवन में गहन शांति का मार्ग दिखाता है।

प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार जबरन थामे रखना भय और पीड़ा पैदा करता है। हम अक्सर रिश्तों, अपेक्षाओं और पुराने अनुभवों से चिपके रहते हैं। यही आसक्ति हमें बांधती है और अशांति का कारण बनती है। छोड़ना एक कठिन प्रक्रिया है पर यही मुक्ति दिलाती है।

छोड़ने का अर्थ कमजोरी नहीं है। यह एक आंतरिक शक्ति और समझदारी का प्रतीक है। जीवन की सच्चाई यही है कि कुछ चीजें अस्थायी होती हैं। उन्हें जबरन रोकने की कोशिश व्यर्थ की पीड़ा देती है। सच्ची शांति पकड़ने से नहीं, छोड़ने से मिलती है।

आत्मिक विकास के लिए जाने देना जरूरी है। विषाक्त रिश्ते या स्थितियां आत्मसम्मान को क्षति पहुंचाती हैं। ऐसे में उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना ही बुद्धिमानी है। यह स्वयं के प्रति प्रेम और सम्मान का फैसला है। यह किसी से घृणा नहीं, बल्कि स्वयं को प्राथमिकता देना है।

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मन को शांत करने के लिए बल नहीं, विश्राम चाहिए। लगातार पकड़े रहने की कोशिश मन को थका देती है। इस थकान के बाद ही सच्ची समझ और बोध जन्म लेता है। मौन और एकांत में व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाता है।

संतुलन जीवन का आधार है। जिसके भीतर संतुलन आ जाता है वह अडिग हो जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी बाहरी चीज पर निर्भर नहीं रहता। उसे अपनी आंतरिक शक्ति का एहसास होता है। यही अवस्था सच्ची स्वतंत्रता लाती है।

प्रेमानंद जी महाराज का स्पष्ट मत है कि सच्चा प्रेम पीड़ा नहीं देता। जो बार बार दर्द दे वहां भावनात्मक लगाव हो सकता है। पर सच्चा प्रेम मुक्त करता है, बांधता नहीं। यह समझ जीवन के दृष्टिकोण को बदल देती है।

जीवन की गहरी तृप्ति उन्हें मिलती है जो छोड़ना सीख लेते हैं। यह कला सिखाती है कि कैसे बिना पकड़े जीवन जिया जाए। इससे मिलने वाली शांति अस्थायी सुख से कहीं बड़ी होती है। यह आध्यात्मिक जागरण का एक महत्वपूर्ण चरण है।

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खोने का डर अक्सर हमारी कल्पना का हिस्सा होता है। यह वास्तविकता से ज्यादा भयानक लगता है। इस भय को स्वीकार करना और आगे बढ़ना ही उपाय है। जब हम छोड़ देते हैं तो पाते हैं कि डर वास्तविक नहीं था।

छोड़ने की कला धीरे धीरे आती है। यह एक सतत अभ्यास और आत्मचिंतन की मांग करती है। छोटी छोटी चीजों से शुरुआत की जा सकती है। समय के साथ यह आदत बन जाती है और जीवन सरल होने लगता है।

अंततः छोड़ना जीवन के प्रवाह के साथ चलना सीखना है। यह नियंत्रण करने की इच्छा को त्यागना है। प्रेमानंद जी महाराज का यह संदेश आधुनिक मनुष्य के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। यह तनावमुक्त और सार्थक जीवन जीने की कुंजी प्रदान करता है।

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