New Delhi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को महान स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरि की जन्म शताब्दी पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। पीएम मोदी ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ उनके संघर्ष और वीरतापूर्ण योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि पार्वती गिरि ने न केवल आजादी की लड़ाई लड़ी, बल्कि जीवनभर समाज सेवा और सामुदायिक कल्याण के लिए खुद को समर्पित कर दिया। प्रधानमंत्री ने पिछले महीने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी उनके प्रेरक जीवन का विशेष रूप से उल्लेख किया था।
कौन थीं पार्वती गिरि?
पार्वती गिरि भारत की उन वीरांगनाओं में शामिल हैं, जिन्होंने आजादी के बाद भी कुरीतियों के खिलाफ जंग जारी रखी। इसी समर्पण के कारण उन्हें ‘ओडिशा की मदर टेरेसा’ कहा जाता है। उनका जन्म 19 जनवरी 1926 को ओडिशा में हुआ था। उनके पिता धनंजय गिरि और चाचा दोनों सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। बचपन में ही घर पर होने वाली आजादी की बैठकों ने उनके मन में देशभक्ति का जज्बा भर दिया था।
महज 16 साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि पार्वती गिरि जी ने औपनिवेशिक शासन को खत्म करने में सराहनीय भूमिका निभाई। उन्होंने याद किया कि वह महज 16 साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़ी थीं। सामुदायिक सेवा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और संस्कृति के क्षेत्र में उनका कार्य अतुलनीय है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा सही राह दिखाती रहेगी।
आदिवासियों और वंचितों के उत्थान के लिए समर्पित जीवन
आजादी मिलने के बाद पार्वती गिरि ने अपना पूरा जीवन समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों की सेवा में लगा दिया। उन्होंने आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किए और कई अनाथालयों की स्थापना की। पीएम मोदी ने कहा कि भारत की आजादी एक सामूहिक संघर्ष का परिणाम थी। इसमें पार्वती गिरि जैसी कई बहादुर महिलाओं का योगदान रहा है, जिन्हें अब उचित पहचान मिल रही है। 28 दिसंबर को ‘मन की बात’ में भी पीएम ने उन्हें गरीबों का मसीहा बताकर श्रद्धांजलि दी थी।

