Health News: हर माता-पिता अपने बच्चे को खुश और मजबूत देखना चाहते हैं। लेकिन कई बार अनजाने में ही उनकी कुछ आदतें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पालन-पोषण के कुछ तरीके बच्चों में डर और असुरक्षा पैदा कर सकते हैं। ये गलतियां बच्चे की मासूम खुशी छीन लेती हैं।
बच्चों की भावनाओं को नजरअंदाज करना एक बड़ी गलती है। जब बच्चा दुखी हो और उससे कहा जाए ‘रोना बंद करो’ तो वह अपनी भावनाएं दबाना सीख जाता है। आगे चलकर वह अपनी भावनाओं को समझ नहीं पाता। वह उन्हें सही तरीके से व्यक्त भी नहीं कर पाता है।
सिर्फ सफलता पर प्यार दिखाना
केवल अच्छेनंबर या जीतने पर प्यार दिखाना खतरनाक है। इससे बच्चा सोचने लगता है कि बिना सफलता के वह बेकार है। यह धारणा उसे लगातार तनाव में रखती है। वह हमेशा असफलता के डर से जीने लगता है। उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है।
हर समय परफेक्ट बनने का दबाव भी नुकसानदायक है। हर काम में अव्वल आने की अपेक्षा बच्चे को थका देती है। उसे लगने लगता है कि गलती करना अपराध है। जबकि गलतियां सीखने का एक जरूरी हिस्सा होती हैं। इस दबाव से बच्चा टूट सकता है।
जरूरत से ज्यादा नियंत्रण
बच्चेके हर फैसले में हस्तक्षेप करना उसके विकास में बाधा है। क्या पहनना है या किससे दोस्ती करनी है, यह तय करना उसका अधिकार है। अत्यधिक नियंत्रण बच्चे को डरपोक बना देता है। वह खुद पर भरोसा करना नहीं सीख पाता। वह हमेशा उलझन और असहायता महसूस करता है।
दूसरों से तुलना करना एक और घातक आदत है। ‘देखो वह कितना अच्छा है’ जैसे वाक्य बच्चे के मन में हीन भावना भर देते हैं। वह खुद को कमतर समझने लगता है। इससे उसका आत्मसम्मान गहराई से आहत होता है। वह अंदर ही अंदर टूट जाता है।
भावनात्मक रूप से अनुपस्थित रहना
फोन याकाम में इतने व्यस्त रहना कि बच्चे की बात न सुनें, यह गलत है। इससे बच्चा खुद को अकेला और अनदेखा महसूस करता है। उसे लगता है कि उसकी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है। यह भावनात्मक उपेक्षा उसे गहरा आघात पहुंचाती है। वह खुलकर बातचीत करने से कतराने लगता है।
बिना वजह सख्ती और आदेश देना भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। ‘क्योंकि मैंने कहा है’ जैसे जवाब बच्चे को डराते हैं। वह सवाल पूछना बंद कर देता है। वह अपनी राय व्यक्त करने से घबराने लगता है। इससे उसकी जिज्ञासा और तर्कशक्ति दब जाती है।
समझाने की बजाय डांटना
हर छोटीगलती पर डांटना या सजा देना ठीक नहीं है। इससे बच्चा झूठ बोलना और गलतियां छुपाना सीख जाता है। वह सच बोलने में डर महसूस करने लगता है। उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। वह नई चीजें सीखने के प्रयास से भी बचने लगता है।
मुश्किल समय में बच्चे को सहारा न देना सबसे बड़ी चूक है। जब वह परेशान हो और उसे समझने वाला कोई न मिले तो वह टूट जाता है। वह यह मान लेता है कि उसकी तकलीफ महत्वहीन है। यह सोच उसे भावनात्मक रूप से कमजोर और असुरक्षित बना देती है।
मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि बच्चों को परफेक्ट होने की जगह समझे जाने की जरूरत है। थोड़ा प्यार, धैर्य और भावनात्मक सहारा बहुत काम आता है। यह सरल उपाय बच्चे को खुश और आत्मविश्वासी बना सकते हैं। एक सकारात्मक माहौल ही बच्चे के सर्वांगीण विकास का आधार है।
