New Delhi News: पाकिस्तान के झूठ का अब पूरी दुनिया के सामने पर्दाफाश हो गया है। अमेरिका की नई फाइलों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की असली कहानी बयां कर दी है। इन दस्तावेजों से साफ हुआ है कि संघर्ष विराम के लिए भारत ने नहीं, बल्कि पाकिस्तान ने गिड़गिड़ाकर मदद मांगी थी। उस दौरान पाकिस्तान को डर सता रहा था कि भारतीय सेना दोबारा हमला कर सकती है। अमेरिका में सामने आई इन फाइलों ने इस्लामाबाद के झूठे प्रोपेगेंडा की धज्जियां उड़ा दी हैं।
ट्रंप के दावों की निकली हवा
यह खुलासा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों को भी खारिज करता है, जिसमें उन्होंने युद्ध रुकवाने की बात कही थी। हकीकत यह है कि पाकिस्तान ने ही अमेरिका से जान बचाने की गुहार लगाई थी। पाकिस्तान की लॉबिंग फर्म ‘स्क्वायर पैटन बोग्स’ के दस्तावेजों में इस डर का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से पाकिस्तान घबरा गया था। मोदी ने कहा था कि सैन्य कार्रवाई अभी सिर्फ रुकी है, खत्म नहीं हुई।
सेना के नुकसान से कांप गया था पाकिस्तान
फारा (FARA) के दस्तावेजों के मुताबिक, भारतीय सेना के हमलों ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी थी। भारत ने आतंकी शिविरों और एयरबेस को निशाना बनाया था। इस तबाही को देखकर पाकिस्तानी सैन्य कमांडर डर गए थे। अपनी सेना को मात खाते देख उन्होंने ट्रंप प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की। जबकि बाहर दुनिया को पाकिस्तान यह बता रहा था कि भारत संघर्ष विराम चाहता है। फाइलों ने साबित कर दिया कि यह अनुरोध इस्लामाबाद से आया था।
क्या था ऑपरेशन सिंदूर?
भारत ने 7 मई 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया था। यह 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का मुंहतोड़ जवाब था। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर सटीक हमले किए। इसमें 100 से ज्यादा खूंखार आतंकी मारे गए थे। यह भीषण संघर्ष चार दिनों तक चला था। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ था। पाकिस्तानी अधिकारी भारत के गुस्से से बचने के लिए अमेरिका में लगातार बैठकें कर रहे थे।
FATF की लिस्ट का भी था डर
पाकिस्तान सिर्फ हमलों से नहीं, बल्कि आर्थिक पाबंदियों से भी डरा हुआ था। उसने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की व्हाइट लिस्ट में बने रहने के लिए अमेरिका में भारी लॉबिंग की। दस्तावेजों से पता चलता है कि पाकिस्तान ने ईमेल और फोन के जरिए अमेरिका से कई बार संपर्क किया। उसने पुरानी एफएटीएफ प्रक्रिया को मुश्किल बताया और अमेरिका से मदद की भीख मांगी। वह चाहता था कि अमेरिका उसकी ‘प्रगति’ को स्वीकार करे ताकि वह फिर से ग्रे-लिस्ट में न जाए।
