मंगल पांडे नही, तिलका मांझी थे स्वतंत्रता संग्राम के सबसे पहले शहीद

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13 जनवरी 1785 को अंग्रेज़ों द्वारा सरेआम बरगद के पेड़ पर लटका कर मार दिए गए, जबरा पहाड़िया यानी तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को हुआ था. वे आधुनिक भारत के पहले शहीद हैं. जिन मंगल पांडेय को भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई के लड़ाके और शहीद के रूप में याद किया जाता है,उनका जन्म तिलका मांझी की शहादत के करीब 42 वर्ष बाद हुआ था.

मंगल पांडेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को हुआ था और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दी गई थी. वैसे भी अगर चर्बी वाले कारतूस न लाए गए होते तो बंगाल नेटिव इनफैंट्री में सिपाही की नौकरी कर रहे मंगल पांडे की बंदूक किसके खिलाफ चलती, इसकी कल्पना की जा सकती है.

तिलका मांझी के बाद अनेक आदिवासी नायकों ने अंग्रेज़ों और ज़मींदारों ( दिकुओं) के खिलाफ संघर्ष किया और मौत की सज़ा पाई. इसमें बिरसा मुंडा भी शामिल हैं, जिनको केवल 25 वर्ष की उम्र में ज़हर देकर अंग्रेज़ों ने मार डाला था. बिरसा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को हुआ और जिन्हें 9 जून 1900 को अंग्रेज़ों ने मार डाला. ये महान कुर्बानियां हैं, पर उच्च जातीय और अभिजात्य वर्गीय इतिहास दृष्टि ने बहिष्कृत भारत के नायकों को इतिहास से भी बहिष्कृत कर दिया.

लेकिन तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में ज़िंदा रहे. अनेक आदिवासी लड़ाके तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़े. अनके गीतों-कविताओं में तिलका मांझी को विभिन्न रूपों में याद किया जाता है- तुम पर कोडों की बरसात हुई

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