USA News: अमेरिका एक बार फिर अपना नक्शा बदलने की तैयारी में है। रिपब्लिकन सांसद रैंडी फाइन ने ग्रीनलैंड को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी लंबे समय से इस डेनिश क्षेत्र को अमेरिकी शासन में लाना चाहते हैं। इस कदम से अमेरिका और डेनमार्क के रिश्तों में नई हलचल मच गई है। यह प्रस्ताव केवल विस्तार के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा कारणों से लाया गया है।
सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड क्यों है जरूरी?
सांसद रैंडी फाइन ने इस बिल को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया है। उनके मुताबिक, ग्रीनलैंड सिर्फ एक बर्फीला इलाका नहीं है। जो ग्रीनलैंड को नियंत्रित करता है, वही आर्कटिक शिपिंग लेन पर राज करता है। अमेरिका अपने भविष्य को किसी ऐसे शासन के भरोसे नहीं छोड़ सकता जो उसकी सुरक्षा को चुनौती दे। इस विधेयक में राष्ट्रपति ट्रंप को ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का अधिकार देने की बात कही गई है।
बर्फ के नीचे छिपा खजाना और नए रास्ते
आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से व्यापार के लिए नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। अमेरिका इन रास्तों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद खास बनाती है। इसके अलावा, इस क्षेत्र में भारी मात्रा में दुर्लभ खनिज और प्राकृतिक गैस के भंडार होने का अनुमान है। अमेरिका इन प्राकृतिक संसाधनों को अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। यही वजह है कि ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र में शामिल करने की मांग तेज हो गई है।
डेनमार्क के साथ रिश्तों पर असर
ग्रीनलैंड अभी डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। डेनमार्क नाटो (NATO) में अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी देश है। डेनमार्क सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।” इस नए बिल से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है। हालात को संभालने के लिए अमेरिकी सांसदों का एक दल कोपेनहेगन जा रहा है। इस दल का मकसद दोनों देशों के बीच एकता दिखाना और आपसी विश्वास को टूटने से बचाना है।
क्या इतना आसान होगा 51वां राज्य बनाना?
किसी विदेशी क्षेत्र को अमेरिकी राज्य का दर्जा देना एक जटिल प्रक्रिया है। यह केवल एक बिल पेश करने से नहीं होगा। इसके लिए अमेरिकी संसद की मंजूरी के साथ-साथ डेनमार्क की सहमति भी अनिवार्य होगी। अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना भी एक बड़ी चुनौती है। फिलहाल यह विधेयक शुरुआती चरण में है। इसे कानून बनने के लिए भारी राजनीतिक समर्थन की जरूरत होगी। हालांकि, इस प्रस्ताव ने दुनिया भर में एक नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है।
