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NEET PG: अब -40 नंबर वाले भी बनेंगे डॉक्टर! सरकार के फैसले पर मचा बवाल, जानिये क्या है ‘Zero Cut-off’ का पूरा सच

New Delhi News: मेडिकल शिक्षा के इतिहास में एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया गया है। अब माइनस (Negative) नंबर लाने वाले छात्र भी स्पेशलिस्ट डॉक्टर (MD/MS) बन सकेंगे। केंद्र सरकार और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBEMS) ने NEET-PG 2025-26 के लिए कट-ऑफ में भारी कटौती की है। इस नए आदेश के बाद आरक्षित वर्ग (SC, ST, OBC) के उन छात्रों को भी काउंसलिंग में बैठने का मौका मिलेगा, जिनके नंबर शून्य या उससे भी कम हैं।

माइनस 40 नंबर पर भी एडमिशन का रास्ता साफ

केंद्र सरकार ने खाली पड़ी पीजी सीटों को भरने के लिए क्वालीफाइंग पर्सेंटाइल को ऐतिहासिक रूप से घटा दिया है। इस बदलाव के आंकड़े बेहद हैरान करने वाले हैं।

  • General/EWS: पहले कट-ऑफ 50th पर्सेंटाइल थी, जिसे घटाकर अब सिर्फ 7th पर्सेंटाइल कर दिया गया है। अब 103 अंक वाले भी पात्र होंगे।
  • SC/ST/OBC: इनकी पुरानी कट-ऑफ 40th पर्सेंटाइल थी। अब इसे घटाकर 0 (Zero) पर्सेंटाइल कर दिया गया है। तकनीकी रूप से -40 अंक वाले छात्र भी अब आवेदन कर सकेंगे।
  • UR-PwBD: दिव्यांग श्रेणी के लिए कट-ऑफ 45th से घटाकर 5th पर्सेंटाइल (90 अंक) कर दी गई है।
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आखिर क्यों लिया गया ‘जीरो कट-ऑफ’ का फैसला?

सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने इस फैसले के पीछे खाली सीटों का तर्क दिया है। हर साल मेडिकल कॉलेजों में नॉन-क्लीनिकल ब्रांच (जैसे एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री) की हजारों सीटें खाली रह जाती हैं। इन विषयों में छात्र रुचि नहीं लेते। इसका सीधा असर मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी पर पड़ता है। सरकार का मानना है कि कट-ऑफ गिराने से ये सीटें भर जाएंगी और भविष्य में शिक्षकों की कमी दूर होगी।

क्या मिल जाएगी मनपसंद ब्रांच?

पात्र होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कम नंबर वाले छात्रों को रेडियोलॉजी या डर्माटोलॉजी जैसी टॉप ब्रांच मिल जाएगी। काउंसलिंग में मेरिट का नियम ही चलेगा। ‘जीरो पर्सेंटाइल’ वाले छात्रों को केवल वही सीटें मिलेंगी, जिन्हें टॉप रैंकर्स छोड़ देंगे। इसमें ज्यादातर नॉन-क्लीनिकल सीटें शामिल होने की संभावना है।

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डॉक्टरों ने उठाए सवाल, मरीजों की सुरक्षा पर चिंता

इस फैसले ने चिकित्सा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। कई वरिष्ठ डॉक्टरों ने इसका कड़ा विरोध किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि माइनस अंक वाले उम्मीदवार को स्पेशलिस्ट बनने की अनुमति देना खतरनाक हो सकता है। इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता गिरेगी और भविष्य में यह मरीजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ साबित हो सकता है। उनका मानना है कि योग्यता (Merit) से समझौता करना सही कदम नहीं है।

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