Paris News: अमेरिका और यूरोप के दशकों पुराने रिश्तों में अब तक की सबसे बड़ी दरार आ गई है। डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने फ्रांस को कड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया है। फ्रांस की संसद में नाटो (NATO) के ‘इंटीग्रेटेड मिलिट्री कमांड’ से बाहर निकलने का प्रस्ताव पेश किया गया है। यह अमेरिका के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा है। फ्रांस ने साफ कर दिया है कि वह अब अमेरिका के आदेशों का पालन नहीं करेगा।
‘अमेरिका की कठपुतली नहीं बनेगा यूरोप’
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने अंदाज में कहा था कि “अमेरिका के बिना नाटो कुछ भी नहीं है।” इस बयान ने आग में घी का काम किया है। इसके जवाब में फ्रांस की नेशनल असेंबली में वाइस प्रेसिडेंट क्लेमथ गुएट ने एक औपचारिक प्रस्ताव रखा है। इसमें फ्रांस के नाटो कमांड से बाहर निकलने की बात कही गई है। फ्रांस का मानना है कि नाटो अब यूरोप की सुरक्षा के बजाय सिर्फ अमेरिकी हितों को साधने वाला संगठन बन गया है।
क्यों घबराया हुआ है अमेरिका?
फ्रांस का यह कदम अमेरिका के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है। फ्रांस यूरोप की सबसे बड़ी सैन्य ताकत है। यह एक परमाणु संपन्न देश है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी है। नाटो के सिस्टम में अमेरिका रणनीति बनाता है और बाकी देश उसे मानते हैं। लेकिन फ्रांस अब इस व्यवस्था को तोड़ने की तैयारी में है। अगर फ्रांस अलग होता है, तो नाटो की ताकत आधी रह जाएगी।
ग्रीनलैंड और व्यापार पर भी आर-पार
विवाद केवल सेना तक सीमित नहीं है। फ्रांस ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी अमेरिका के आक्रामक रुख का समर्थन करने से इनकार कर दिया है। उधर, यूरोपीय संघ की संसद में भी अमेरिका के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा है। कई सांसद अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को फ्रीज करने या जवाबी प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। यह पहली बार है जब पूरा यूरोप अमेरिका के विस्तारवाद के खिलाफ एकजुट नजर आ रहा है।
