New Delhi News: यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी और एशिया की उभरती ताकत भारत के बीच व्यापार के नए रास्ते खुलने जा रहे हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज इस समय भारत दौरे पर हैं और दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर चर्चा तेज हो गई है। भारत इस समय अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे हाई टैरिफ की चुनौती का सामना कर रहा है। इससे निपटने के लिए भारत अब यूरोपीय देशों के साथ शून्य टैरिफ वाले कारोबार पर फोकस कर रहा है। अगर यह समझौता सफल होता है, तो भारतीय बाजारों में कई विदेशी सामान बेहद सस्ते हो जाएंगे। इस डील के जरिए भारत अपने व्यापारिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की तैयारी में है।
लग्जरी कारों के शौकीनों के लिए खुशखबरी
जर्मनी के साथ इस समझौते का सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर देखने को मिलेगा। भारत आज भी जर्मनी से मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसी महंगी गाड़ियां मंगवाता है। फिलहाल इन कारों पर 60 से 100 फीसदी तक टैक्स लगता है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू होने के बाद ये लग्जरी कारें 20 से 50 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं। इससे न केवल भारत में विदेशी कारों की कीमतें घटेंगी, बल्कि यूरोप से होने वाले कार निर्यात में भी भारी उछाल आएगा। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक उपकरणों का आयात भी पहले से काफी सस्ता हो जाएगा।
अरबों डॉलर का व्यापारिक गणित
भारत और जर्मनी के बीच व्यापारिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं। वित्त वर्ष 2024-25 के आंकड़ों पर नजर डालें तो दोनों देशों के बीच लगभग 33.4 अरब डॉलर का कारोबार हुआ है। इसमें भारत ने जर्मनी को 15.09 अरब डॉलर का सामान बेचा, जबकि वहां से 18.31 अरब डॉलर का सामान मंगवाया। अक्टूबर 2025 के आंकड़े भी यही कहानी बयां करते हैं। इस दौरान भारत ने 82.4 करोड़ डॉलर का निर्यात किया, जबकि आयात का आंकड़ा 1.79 अरब डॉलर रहा। फिलहाल जर्मनी के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 3 अरब डॉलर है, जिसे यह समझौता कम कर सकता है।
क्या खरीदता और बेचता है भारत
भारत मुख्य रूप से जर्मनी को दवाएं, सूती कपड़े, टेक्सटाइल, रसायन और ऑटो कंपोनेंट्स निर्यात करता है। वहीं, जर्मनी से भारत सबसे ज्यादा एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, बिजली बनाने वाली मशीनें और इंडस्ट्रियल मशीनरी खरीदता है। 18 अरब डॉलर के कुल आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी विमानों की ही है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत के लिए जर्मनी 8वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच सेवाओं का व्यापार भी 17 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। पिछले पांच सालों में जर्मनी से भारत को 15.11 अरब डॉलर का विदेशी निवेश (FDI) भी मिला है।
घरेलू बाजार और दवाओं पर असर
इस समझौते के कुछ चुनौतीपूर्ण पहलू भी हैं जिन पर भारत को सतर्क रहना होगा। यूरोपीय कंपनियां पेटेंट सुरक्षा की मांग कर रही हैं। अगर यह मांग मानी गई, तो भारत में सस्ती जेनरिक दवाओं का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जानकारों का मानना है कि कुछ दवाओं की कीमतें कई गुना बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, अगर जर्मनी के डेयरी और मीट उत्पादों को भारतीय बाजार में छूट मिली, तो इसका सीधा असर स्थानीय किसानों पर पड़ेगा। घरेलू उद्योगों को भी जर्मन उत्पादों से कड़ी टक्कर मिल सकती है, जिससे लोकल मार्केट में दाम बढ़ने का खतरा बना रहेगा।
