मंडी की सती गाथा: जब 252 महिलाओं को राजाओं की चिता पर जिंदा जला दिया गया, बरसेलों में कैद है खौफनाक सच

Himachal News: मंडी रियासत के सुनहरे इतिहास के पीछे एक ऐसा काला सच छिपा है जिसे सुनकर रूह कांप जाती है। करीब 1637 से 1846 के बीच मंडी के राजाओं की मृत्यु पर उनकी रानियों, ख्वासों और रखैलों को जबरन मौत के घाट उतार दिया गया। पुरातात्विक सर्वेक्षणों के अनुसार, इस क्रूर सती प्रथा की भेंट कुल 252 महिलाएं चढ़ीं। आज भी मंडी में सुकेती नाले के किनारे खड़े ‘बरसेले’ (स्मारक पत्थर) उन महिलाओं की चीखों और उस भयानक दौर की गवाही देते हैं, जिसे इतिहास ने लंबे समय तक दबाए रखा।

राजा श्याम सेन की चिता पर जलीं 94 महिलाएं

इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1679 का साल सबसे भयावह नजर आता है। जब राजा श्याम सेन की मृत्यु हुई, तो उनके शव के साथ 5 रानियां, 2 ख्वासें और 87 रखैलों को जिंदा जला दिया गया। अलेग्जेंडर कनिंघम के शोध बताते हैं कि रियासत काल में महिलाओं को केवल पुरुष की संपत्ति माना जाता था। सती होने का सबसे पुराना प्रमाण 1664 में मिलता है, जब राजा सूरज सेन की रानी ने अपने प्राण त्यागे थे। इन महिलाओं की याद में बने पत्थरों को स्थानीय भाषा में ‘बरसेला’ कहा जाता है, जो आज राष्ट्रीय स्मारक घोषित हैं।

नशे की हालत में चिता की ओर धकेली जाती थीं औरतें

अंग्रेज यात्री विग्ने ने 1839 में अपनी आंखों से मंडी में एक महिला को सती होते देखा था। उनके वर्णन के अनुसार, विधवाओं को चिता पर ले जाने से पहले भांग और अफीम देकर बेहोश कर दिया जाता था। दो ब्राह्मण उन्हें सहारा देकर भीड़ के बीच ले जाते थे, जहाँ लोग धार्मिक जयकारे लगाते थे। महज आधे घंटे के भीतर चिता तैयार कर उन्हें राख के ढेर में बदल दिया जाता था। यह क्रूरता इतनी गहरी थी कि 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगने के बावजूद मंडी में यह 1846 तक चोरी-छिपे जारी रही।

लोकगाथाओं में जिंदा है दर्द: भानू का झेरा और सराड़-रा-धार

मंडी की लोक संस्कृति और गीतों में भी इस प्रथा का मार्मिक वर्णन है। ‘भानू का झेरा’ नामक गाथा सुनाते समय आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। यह कहानी मंत्री दुग्गल के पुत्र भानू की है, जिसकी मृत्यु के बाद उसकी दो पत्नियां सती हो गई थीं। इसी तरह ‘सराड़-रा-धार’ पहाड़ी पर सौ साल पहले शौनी देवी अपने पति की चिता में कूद गई थीं। आज भी लोग उन स्थानों से गुजरते समय हरी पत्तियां चढ़ाकर उन आत्माओं की शांति के लिए दुआ मांगते हैं।

पत्थर फेंकने की अनोखी परंपरा और मान्यताओं का बोझ

मंडी के गांवों में आज भी सती स्थलों पर पत्थर रखने या फेंकने की परंपरा मौजूद है। गुरकोठा के ‘सतिया-रा-गलू’ और टांडा के ‘सतिया-रा-पीपल’ जैसे स्थानों पर लोग छोटे-छोटे पत्थर जमा करते हैं। माना जाता है कि सती होने वाली महिलाओं ने जाते समय वहां पत्थर रखे थे। यह परंपरा उस खौफनाक सामाजिक व्यवस्था की याद दिलाती है, जहां राजाओं के जाने के बाद महिलाओं का अस्तित्व मिटा देना ही रिवाज था। बलद्वाड़ा क्षेत्र में खेतों से निकले बरसीले साबित करते हैं कि यह प्रथा पूरे शासक वर्ग में जड़ें जमा चुकी थी।

Hot this week

Related Articles

Popular Categories