पश्चिम बंगाल चुनाव में विकास का मुद्दा चलेगा, भावनात्मक मुद्दों पर मतदाता प्रभावित होकर वोट डालेगा, या फिर भावनाओं के ज्वार के साथ विकासवादी एजेंडा का सियासी कॉकटेल कारगर होगा? राजनीतिक दल मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए हर तरीका अपना रहे हैं, लेकिन वोट की चोट कहां होगी और मतदाता किस पर मेहरबान होगा अभी सियासी जानकार खुलकर किसी दल पर दांव नहीं लगा रहे हैं।

मतदाताओं को साधने की कोशिश 

जानकारों का कहना है कि बंगाल चुनाव में राम, दुर्गा, शिव की भक्ति के बहाने मतदाताओं को साधने की कोशिश जारी है। लेकिन, साथ में विकास पर भी आस कम नहीं है। भाजपा हो या तृणमूल हर तरफ नहले पर दहला की कवायद चल रही है। हाल में तृणमूल छोड़कर भाजपा में आए दिनेश त्रिवेदी का कहना है कि बंगाल में परिवर्तन की हवा चल रही है। लेकिन, तृणमूल नेता 2016 के चुनाव की याद दिलाते हुए कहते हैं कि जो परिवर्तन की बात कर रहे हैं, वे जनता की नब्ज नहीं टटोल पा रहे हैं।

बंगाल का मौजूदा गणित समझना आसान नहीं

दरअसल, बंगाल का सियासी गणित बहुत दिलचस्प हो चला है। अतीत पर नजर डालें तो बंगाल की संस्कृति और मिजाज ध्रुवीकरण का संकेत नहीं देता। लेकिन, जानकारों का कहना है कि सियासी फिजां कब बदल जाए, कहना मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनाव के आंकड़ों से तुलना करके बंगाल का मौजूदा गणित नहीं समझा जा सकता। सूबे की राजनीति एक नए ढर्रे पर जाती नजर आ रही है। दावा किया जा रहा है कि यहां जय श्री राम का नैरेटिव चुनावी मंचों के जरिए नीचे तक पहुंचाने की कोशिश कई इलाकों तक पहुंच गई है। वहीं, मां दुर्गा की पूजा के माध्यम से तृणमूल भाजपा को जवाब देने के साथ स्त्री सशक्तिकरण और बंगाल की संस्कृति का संदेश भी मतदाताओं तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।

ममता ने 50 महिलाओं को टिकट देकर बड़ा दांव चला 

जानकारों का कहना है कि राम बनाम दुर्गा नैरेटिव के ज़रिए तृणमूल महिला शक्ति की अहमियत जताना चाहती है। उनकी आंतरिक चुनावी बैठकों में इस रणनीति को स्पष्ट भी किया गया है। पश्चिम बंगाल में महिला वोटरों की तादाद तक़रीबन 49 फ़ीसदी है। ममता ने 50 महिलाओं को टिकट देकर महिलाओं का समर्थन हासिल करने का बड़ा दांव भी चला है। योजनाओं के ज़रिए केंद्र सरकार ने महिला वोटरों में पैठ बनाई। उधर, उज्जवला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, जन धन योजनाओं के ज़रिए केंद्र सरकार ने हर राज्य के महिला वोटरों में अपनी पैठ बनाई है। ममता ने साइकिल योजना और स्वास्थ्य योजना के ज़रिए विकास का एजेंडा भी रखा है। राज्य में कराए गए अन्य कामकाज का भी हवाला दिया जा रहा है। फिलहाल काम असर दिखाएगा या काम न कर पाना मुद्दा बनेगा। धर्म-कर्म का संदेश असरदार होगा या बदलाव की बयार बहेगी। सियासी दल भी इन तमाम सियासी पेंच पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं नजर आते हैं।

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