Maharashtra News: महाराष्ट्र के मालेगांव नगर निगम चुनाव के नतीजों ने नया राजनीतिक समीकरण पेश किया है। दशकों से कांग्रेस के गढ़ रहे इस शहर में आईएसएलएएम और एआईएमआईएम ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। कांग्रेस सिर्फ तीन सीटों पर सिमट गई। भाजपा को केवल दो सीटें मिली। यह नतीजे राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ गए हैं।
पावरलूम सिटी के नाम से मशहूर मालेगांव में कुल 84 सीटों के लिए चुनाव हुए। बहुमत के लिए 43 सीटों की जरूरत है। पूर्व राकांपा विधायक आसिफ शेख की नई पार्टी आईएसएलएएम ने 35 सीटें जीतीं। असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की। शिवसेना ने 18 सीटें हासिल कीं।
आईएसएलएएम और एआईएमआईएम ने तोड़ा कांग्रेस का वर्चस्व
आईएसएलएएम पार्टीने अपने पहले ही चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली हैं। दोनों दल मिलाकर 40 सीटों के आंकड़े के करीब पहुंच गए। बहुमत के लिए अभी तीन सीटें कम हैं।
एआईएमआईएम ने पिछले चुनाव के मुकाबले प्रदर्शन में तीन गुना सुधार किया। पिछली बार पार्टी को सात सीटें मिली थीं। इस बार वह 21 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। यह प्रदर्शन पार्टी की बढ़ती ताकत को दर्शाता है। शिवसेना ने भी छह सीटें बढ़ाकर 18 पर जीत हासिल की।
कांग्रेस और भाजपा को मिली करारी हार
मुस्लिम बहुल इस इलाकेमें कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। पिछली बार सत्ता में रही कांग्रेस इस बार मात्र तीन सीटों पर सिमट गई। इनमें से दो सीटें पार्टी के शहर अध्यक्ष एजाज बेग और उनकी पत्नी ने जीती हैं। यह परिणाम पार्टी के लिए बड़ा झटका है।
भाजपा की स्थिति भी चिंताजनक रही। पार्टी को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा। इससे साफ है कि पावरलूम शहर में पार्टी की पकड़ कमजोर हुई है। दोनों राष्ट्रीय दलों के खराब प्रदर्शन ने स्थानीय दलों के लिए रास्ता खोल दिया। यह चुनावी रुझान भविष्य के लिए संकेत देता है।
मुस्लिम वोट बैंक पर उठ रहे सवाल
मालेगांव केनतीजों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या मुस्लिम वोट बैंक अब कांग्रेस के हाथ से निकल रहा है? आईएसएलएएम और एआईएमआईएम ने मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस की पकड़ को कमजोर कर दिया है। इसने चुनावी मैदान में एक नया शक्ति केंद्र बना दिया है।
स्थानीय स्तर पर मुस्लिम मतदाताओं का यह झुकाव कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बन गया है। पार्टी को डर है कि वोटों का यह बिखराव आगामी चुनावों में उसके गढ़ को ढहा सकता है। यह रुझान अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
महाराष्ट्र की विरासत राजनीति के लिए चुनौती
मालेगांव केपरिणामों ने महाराष्ट्र की विरासत राजनीति को चुनौती दी है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि नए समीकरणों ने बड़े नेताओं के सामने बड़ी चुनौती पेश की है। उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसे कद्दावर नेताओं को नई रणनीति बनानी होगी।
मुंबई और पुणे के चुनावी रुझानों के साथ मालेगांव के नतीजे महत्वपूर्ण हैं। यह दर्शाता है कि स्थानीय मुद्दे और सामुदायिक समीकरण राष्ट्रीय दलों से बड़े हो सकते हैं। भविष्य के चुनावों में इन नए दलों की भूमिका बढ़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
