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जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, अब महाभियोग की राह पर चलेगा मामला

National News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रहे कैश कांड का मामला अब एक निर्णायक मोड़ पर है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस वर्मा ने लोकसभा स्पीकर के फैसले और जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 के तहत शुरू की गई प्रक्रिया को चुनौती दी थी।

इस फैसले के बाद अब उनके खिलाफ जांच का रास्ता पूरी तरह से खुल चुका है। महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने एक स्पष्ट संदेश दिया है। संवैधानिक संस्थाएं तय प्रक्रिया से पीछे नहीं हटेंगी।

कैश कांड का पूरा बैकग्राउंड क्या है?

यह मामलामार्च 2025 में सामने आया। दिल्ली हाईकोर्ट के एक सरकारी बंगले में आग लग गई। यह बंगला जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास के तौर पर दर्ज था। आग बुझाने के दौरान फायर सर्विस को एक स्टोर रूम से जले हुए नोटों की गड्डियां मिलीं।

शुरुआती आकलन में यह रकम करीब 2.5 करोड़ रुपए बताई गई। यह रकम कथित तौर पर अनएकाउंटेड थी। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला तूल पकड़ गया। जस्टिस वर्मा ने सफाई दी कि यह रकम उनकी वैध आय से जुड़ी है।

घटना के बाद क्या कदम उठाए गए?

घटनाके कुछ ही दिनों बाद जस्टिस यशवंत वर्मा का दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया। वह निलंबन की स्थिति में रहे।

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जांच एजेंसियों ने कैश के स्रोत और आग लगने के कारणों की जांच शुरू की। इसके समानांतर, संसद में जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 के तहत महाभियोग प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। लोकसभा स्पीकर ने इस पर कार्रवाई की।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

जस्टिस वर्माकी दलील थी कि जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत जांच समिति बनाने से पहले लोकसभा और राज्यसभा दोनों की मंजूरी जरूरी है। उनका कहना था कि राज्यसभा में प्रस्ताव पास होने तक लोकसभा स्पीकर समिति गठित नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत लोकसभा स्पीकर को समिति गठन का अधिकार है। प्रक्रिया में कोई संवैधानिक खामी नहीं है। इस फैसले ने जांच को हरी झंडी दे दी।

जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत प्रक्रिया क्या है?

इस कानून केतहत जज को हटाने की प्रक्रिया बेहद सख्त है। पहले संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है। लोकसभा स्पीकर एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। यह समिति आरोपों की गहन जांच करती है।

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समिति आरोपों की जांच कर रिपोर्ट संसद को सौंपती है। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है। यही वजह है कि भारत में जजों के खिलाफ महाभियोग के मामले बेहद दुर्लभ रहे हैं।

अब जांच प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी?

सुप्रीम कोर्ट केफैसले के बाद लोकसभा स्पीकर जांच समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू करेंगे। जस्टिस वर्मा को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा। समिति गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करेगी।

यह प्रक्रिया कई महीनों तक चल सकती है। समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रख्यात ज्यूरिस्ट शामिल होते हैं। उनकी रिपोर्ट ही आगे की कार्रवाई का आधार बनेगी।

जस्टिस वर्मा के लिए आगे क्या विकल्प बचते हैं?

अगर जांच समितिउन्हें दोषमुक्त पाती है, तो वे दोबारा न्यायिक कार्य कर सकते हैं। लेकिन अगर आरोप साबित होते हैं, तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाएगा। इस स्थिति में उनके पद से हटाए जाने की संभावना बन सकती है।

इस्तीफा देना भी एक विकल्प हो सकता है। लेकिन तब भी मामले की नैतिक और कानूनी छाया बनी रहेगी। यह मामला न्यायपालिका की जवाबदेही से सीधे जुड़ा हुआ है। पूरी प्रक्रिया पर देश की नजर रहेगी।

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