New Delhi News: भारत में उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय दिलाने वाली व्यवस्था खुद बीमार पड़ गई है। उपभोक्ता आयोगों में जजों और सदस्यों की आधी से ज्यादा कुर्सियां खाली पड़ी हैं। न्याय की आस में बैठे लोगों का हर तीसरा मामला तीन साल से ज्यादा समय से लटका हुआ है। ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ की नई ‘कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026’ ने इस कड़वी सच्चाई को सामने रखा है। बुधवार को दिल्ली में जारी इस रिपोर्ट ने देश की उपभोक्ता न्याय प्रणाली की पोल खोल दी है।
आधे से ज्यादा पद खाली, कौन सुनेगा फरियाद?
राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों का हाल बहुत बुरा है। साल 2025 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक यहां अध्यक्ष के 50 प्रतिशत पद खाली हैं। सदस्यों के भी लगभग 40 प्रतिशत पद अभी तक नहीं भरे गए हैं। जिला उपभोक्ता फोरम की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। वहां भी अध्यक्ष के करीब 32 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं। पदों के खाली होने से शिकायतों के निपटारे की रफ्तार बहुत धीमी हो गई है। न्याय का पहिया लगभग थम सा गया है।
तीन महीने का नियम, लेकिन तीन साल का इंतजार
कानून कहता है कि उपभोक्ता की शिकायत का निपटारा तीन महीने में होना चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। देश के 19 राज्य आयोगों ने चौंकाने वाले आंकड़े दिए हैं। इनके मुताबिक 35 प्रतिशत से अधिक मामले तीन साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। देश में कुल 775 जिले हैं। नियम के मुताबिक हर जिले में एक उपभोक्ता अदालत होनी चाहिए। लेकिन अभी केवल 685 जिला उपभोक्ता अदालतें ही काम कर रही हैं। लोगों को न्याय के लिए आज भी दूसरे जिलों में भटकना पड़ता है।
बीमा और बिल्डरों से लोग सबसे ज्यादा परेशान
रिपोर्ट साफ बताती है कि लोग सबसे ज्यादा किन कंपनियों से परेशान हैं। राज्य आयोगों में सबसे ज्यादा 25.1 प्रतिशत शिकायतें बीमा क्षेत्र की हैं। इसके बाद 18.7 प्रतिशत मामले आवास क्षेत्र के हैं। बैंकिंग क्षेत्र की 8.7 प्रतिशत शिकायतें दर्ज हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का हाल तो और भी हैरान करने वाला है। वहां करीब 44 प्रतिशत मामले सिर्फ आवास क्षेत्र यानी बिल्डरों के खिलाफ हैं। लोगों को जीवन भर की कमाई लगाने के बाद भी तय समय पर फ्लैट या घर नहीं मिल रहा है।
आंध्र प्रदेश और मेघालय ने पेश की अच्छी नजीर
इस रिपोर्ट में राज्यों के कामकाज की रैंकिंग भी जारी की गई है। बड़े और मध्यम राज्यों की श्रेणी में आंध्र प्रदेश ने पहला स्थान हासिल किया है। मध्य प्रदेश दूसरे और राजस्थान तीसरे नंबर पर मौजूद है। इसके बाद कर्नाटक और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। छोटे राज्यों की बात करें तो मेघालय सबसे ऊपर है। सिक्किम दूसरे और हिमाचल प्रदेश तीसरे स्थान पर है।
मामलों के निपटारे में दिखा मामूली सुधार
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने बुधवार को यह रिपोर्ट जारी की। उन्होंने आयोगों में खाली पदों पर गहरी चिंता जताई। ‘कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026’ की संपादक माया दारुवाला ने मजबूत संस्थागत ढांचे को बेहद जरूरी बताया। हालांकि रिपोर्ट में कुछ अच्छी खबरें भी हैं। मामलों के निपटारे की दर में थोड़ा सुधार हुआ है। साल 2020 में यह दर लगभग 50 प्रतिशत थी। साल 2023 में यह 108 प्रतिशत और 2024 में 98 प्रतिशत रही। राज्य आयोगों के बजट में भी 52 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन पद नहीं भरे गए तो न्याय व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।


