India News: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के एक प्रमुख रॉकेट ने शनिवार को उड़ान भरी और अपना रास्ता बदल लिया। पीएसएलवी रॉकेट ने एक नए सैन्य उपग्रह और 15 अन्य पेलोड को लेकर उड़ान भरी थी। तीसरे चरण में एक गड़बड़ी के कारण यह निर्धारित पथ से भटक गया। आशंका है कि सभी 16 अंतरिक्ष यान नष्ट हो गए हैं। इस विफलता ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को झटका दिया है।
यह घटना 12 जनवरी की सुबह श्रीहरिकोटा से हुई प्रक्षेपण के दौरान घटी। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल ने ईओएस-एन1 उपग्रह को लेकर उड़ान भरी थी। इस उपग्रह को अन्वेषण नाम से भी जाना जाता है। प्रक्षेपण के शुरुआती चरण सामान्य रूप से पूरे हुए थे। लेकिन तीसरे चरण के प्रज्वलन के तुरंत बाद समस्या शुरू हुई।
मिशन नियंत्रण केंद्र ने तत्काल एक विसंगति की सूचना दी। उन्होंने रॉकेट के निर्धारित पथ से विचलन को रिकॉर्ड किया। इस विचलन के कारण रॉकेट अपने लक्षित कक्षा तक नहीं पहुंच सका। इसरो के अधिकारियों ने बाद में मिशन की विफलता की पुष्टि की। उन्होंने सभी पेलोड के नष्ट होने की आशंका जताई।
तीसरे चरण की गड़बड़ी बनी मुख्य वजह
इसरोके अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने इस घटना पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि तीसरे चरण का प्रज्वलन शुरू में ठीक लगा। लेकिन एक तकनीकी गड़बड़ी ने रॉकेट की दिशा बदल दी। इस विफलता के सटीक कारण का पता लगाने के लिए एक समिति गठित की गई है। यह समिति पूरी घटना की जांच करेगी।
यह पीएसएलवी की लगभग 60 उड़ानों में एक दुर्लभ विफलता है। इस रॉकेट ने अब तक लगभग 90 प्रतिशत सफलता दर हासिल की है। पिछले साल मई में भी इसी तरह की तीसरे चरण की समस्या सामने आई थी। उस घटना के बाद यह इस लॉन्चर की पहली उड़ान थी।
अन्वेषण सैन्य उपग्रह का उद्देश्य
ईओएस-एन1 एक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-इमेजिंग उपग्रह था।इसे भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया था। यह उपग्रह सैकड़ों स्पेक्ट्रल बैंड में पृथ्वी की छवियां ले सकता था। इसकी मदद से जमीन की लगातार निगरानी संभव थी।
इसकी उच्च रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें रक्षा एवं खुफिया जानकारी के लिए महत्वपूर्ण थीं। यह प्रौद्योगिकी संसाधन मैपिंग और पर्यावरण निगरानी में भी सहायक होती। इस उपग्रह के नष्ट होने से इन क्षेत्रों में डेटा संग्रहण प्रभावित हुआ है।
अन्य 15 पेलोड में क्या था शामिल
इस मिशन में15 छोटे उपग्रह भी शामिल थे। इनमें ब्रिटेन और थाईलैंड का एक पृथ्वी अवलोकन पेलोड था। ब्राजील का एक समुद्री बीकन भी इनमें शामिल था जो मछुआरों के लिए उपयोगी होता। भारत का एक इन-ऑर्बिट ईंधन भरने का प्रदर्शनकारी उपकरण भी था।
स्पेन का एक केआईडी री-एंट्री कैप्सूल भी इस रॉकेट पर सवार था। ये सभी उपग्रह निम्न पृथ्वी कक्षा में स्थापित किए जाने थे। इनके नष्ट होने से संबंधित देशों के वैज्ञानिक अध्ययन प्रभावित हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से बने इन पेलोड का नुकसान महत्वपूर्ण है।
भविष्य के मिशनों पर क्या होगा प्रभाव
इस विफलताके बाद इसरो की आगामी योजनाओं पर नजर है। संगठन ने पिछले वर्षों में कई सफल मिशन पूरे किए हैं। चंद्रयान-3 और आदित्य एल1 मिशन ने वैश्विक पहचान बनाई थी। पीएसएलवी को भारत के विश्वसनीय प्रक्षेपण वाहन के रूप में जाना जाता था।
तकनीकी समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही भविष्य की रणनीति स्पष्ट होगी। डिजाइन में संशोधन की आवश्यकता पर विचार किया जा सकता है। आगामी प्रक्षेपणों की समयसारिणी भी इस जांच पर निर्भर करेगी। इसरो ने पहले भी ऐसी चुनौतियों से उबरकर सफलता हासिल की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष मिशनों में ऐसे जोखिम हमेशा बने रहते हैं। प्रत्येक विफलता नई सीख देती है और प्रणालियों को मजबूत बनाती है। इसरो की टीम इस घटना का गहन विश्लेषण कर रही है। उनकी खोज सुनिश्चित करेगी कि भविष्य के मिशन और अधिक विश्वसनीय हों।
