मंगलवार, जनवरी 6, 2026
1.7 C
London

UP की धरती उगलने वाली है ‘काला सोना’? जानें जमीन के हजारों फीट नीचे वैज्ञानिक कैसे ढूंढते हैं कच्चा तेल

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद, औरैया और कन्नौज जिलों से एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आ रही है। इन क्षेत्रों में जमीन के नीचे कच्चे तेल के विशाल भंडार होने के प्रारंभिक संकेत मिले हैं। इस खबर ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि वैज्ञानिकों के बीच भी उत्सुकता पैदा कर दी है। आखिर हजारों फीट नीचे दबे इस ‘काले सोने’ का पता कैसे लगाया जाता है? वैज्ञानिकों की यह जटिल प्रक्रिया सतह के विश्लेषण से शुरू होकर आधुनिक 3D मैपिंग तक जाती है। तेल की खोज में भूकंपीय सर्वे और ग्रेविटी विश्लेषण जैसे उच्च तकनीक वाले चरणों का पालन किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ड्रिलिंग आर्थिक रूप से फायदेमंद होगी।

शुरुआती जांच: पत्थरों और मिट्टी का बारीकी से अध्ययन

कच्चे तेल की खोज की शुरुआत जमीन की सतह से होती है। भूविज्ञानी सबसे पहले इलाके की चट्टानों और मिट्टी की संरचना का गहराई से अध्ययन करते हैं। वे मुख्य रूप से ‘तलछटी चट्टानों’ की तलाश करते हैं, क्योंकि तेल केवल इन्हीं परतों के बीच पाया जा सकता है। लाखों साल पुराने जीवाश्म और प्राचीन वनस्पतियों के अवशेष यह संकेत देते हैं कि क्या वह स्थान कभी घना जंगल या समुद्र का हिस्सा था। पेट्रोलियम बनने के लिए ऐसी भौगोलिक स्थितियां बहुत जरूरी मानी जाती हैं।

यह भी पढ़ें:  पानीपत: दूसरी कक्षा के छात्र को स्कूल काम नहीं लाने पर ड्राइवर ने खिड़की से उल्टा लटकाकर पीटा, वीडियो वायरल

भूकंपीय सर्वे: कंपन से बनती है पाताल की तस्वीर

तेल खोजने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘भूकंपीय सर्वे’ (Seismic Survey) है। इसमें जमीन पर नियंत्रित मात्रा में कंपन पैदा की जाती है। इसके लिए छोटे विस्फोटकों या विशेष कंपन ट्रकों का उपयोग होता है। ये कंपन तरंगें जमीन के नीचे जाकर अलग-अलग चट्टानी परतों से टकराकर वापस लौटती हैं। इन संकेतों को ‘जियोफोन’ नामक सेंसर रिकॉर्ड करते हैं। वैज्ञानिक इन आंकड़ों की मदद से जमीन के नीचे की 2D और 3D तस्वीरें तैयार करते हैं, जिससे तेल के कुओं की सटीक लोकेशन पता चलती है।

गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र का विश्लेषण

भूकंपीय सर्वे के साथ वैज्ञानिक पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को भी मापते हैं। तेल वाली चट्टानें आमतौर पर आसपास की अन्य चट्टानों की तुलना में कम घनी (Less Dense) होती हैं। चट्टानों की डेंसिटी में यह अंतर गुरुत्वाकर्षण सर्वे के जरिए आसानी से पकड़ा जा सकता है। यह तकनीक ड्रिलिंग के फैसले को और अधिक मजबूत बनाती है।

यह भी पढ़ें:  उपराष्ट्रपति इस्तीफा: जगदीप धनखड़ से कोरे कागज पर करवाए थे साइन, उपराष्ट्रपति को हटाने की स्क्रिप्ट हुई लीक

ड्रिलिंग और रिजर्व टेस्टिंग: आखिरी फैसला

जब सर्वे डेटा से तेल की मौजूदगी के पक्के सबूत मिल जाते हैं, तब कंपनियां ड्रिलिंग का काम शुरू करती हैं। यह एक अत्यंत महंगा और जोखिम भरा काम है। ड्रिलिंग के दौरान ‘वेल लॉगिंग’ की जाती है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कुएं में नीचे डाला जाता है। ये उपकरण चट्टानों के दबाव, तापमान और तेल की मात्रा को मापते हैं। यदि रिपोर्ट सकारात्मक आती है, तभी व्यावसायिक तौर पर उत्पादन शुरू किया जाता है। भारत में पेट्रोलियम संसाधनों पर पूर्ण अधिकार सरकार का होता है, और प्रभावित जमीन मालिकों को मुआवजे के रूप में लीज पेमेंट दी जाती है।

Hot this week

Related News

Popular Categories