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अमेरिका की बादशाहत खत्म? डॉलर को बचाने के लिए ट्रंप ने चली खतरनाक चाल, भारत और चीन पर मंडराया संकट!

Washington News: अमेरिका (America) दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क है। उसकी असली ताकत उसकी करेंसी ‘डॉलर’ है। साल 1990 के बाद से डॉलर ने पूरी दुनिया पर राज किया है। लेकिन अब अमेरिका की यह बादशाहत खतरे में है। भारत, चीन और रूस जैसे देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं। इसे देखकर अमेरिका घबरा गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब डॉलर को छोड़ने वाले देशों को खुली धमकी दे दी है। उन्होंने साफ कहा है कि जो देश डॉलर का साथ छोड़ेंगे, उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

डॉलर के खिलाफ एकजुट हुए देश

दुनिया अब बदल रही है। कई देश अमेरिका के प्रतिबंधों और दादागिरी से परेशान हैं। वे अब ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) की राह पर चल पड़े हैं। इसका मतलब है व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल कम करना। चीन और भारत अपनी स्थानीय मुद्राओं (Currency) में व्यापार बढ़ा रहे हैं।
ब्रिक्स (BRICS) संगठन भी डॉलर का विकल्प तैयार कर रहा है। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया की 40% अर्थव्यवस्था और 26% व्यापार है। अगर ये देश डॉलर को छोड़ देते हैं, तो अमेरिका को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान होगा। केंद्रीय बैंक भी अब डॉलर की जगह सुरक्षित निवेश के लिए सोना खरीद रहे हैं।

ट्रंप की टैरिफ वाली धमकी

डॉलर का कमजोर होना अमेरिका के सुपरपावर स्टेटस के लिए खतरा है। अगर डॉलर वैश्विक करेंसी नहीं रहा, तो अमेरिका का आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा। इसी डर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक हो गए हैं। वे डी-डॉलराइजेशन को रोकने के लिए टैरिफ (Tariff) का हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि डॉलर को चुनौती देने वाले देशों के सामानों पर अमेरिका भारी टैक्स लगाएगा।

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एक्सपर्ट्स की राय: अमेरिका कर रहा गलती

विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की यह नीति उल्टी पड़ सकती है। जेएनयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका टैरिफ को हथियार बना रहा है। इससे डरने के बजाय दुनिया बहु-मुद्रा व्यवस्था (Multi-currency system) की तरफ तेजी से बढ़ सकती है।
वहीं, आर्थिक विशेषज्ञ विकास सिंह का मानना है कि अमेरिका चिंतित है। उसे पता है कि डॉलर के बिना वह कमजोर हो जाएगा। इसलिए वह दूसरे देशों को धमका रहा है।

कैसे ‘किंग’ बना था डॉलर?

  • 1920: डॉलर ने दुनिया की मुख्य करेंसी के रूप में पाउंड की जगह ली।
  • 1944: ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट के तहत अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में तय हुआ।
  • 1971: राष्ट्रपति निक्सन ने डॉलर को सोने (Gold) से बदलने पर रोक लगा दी।
  • 2008: मंदी के दौरान भी निवेशकों ने डॉलर पर भरोसा जताया था।
    आज हालात अलग हैं। यूरोप और जापान की करेंसी भी टक्कर दे रही हैं। अमेरिका में महंगाई और कर्ज बढ़ने से डॉलर की साख पर सवाल उठ रहे हैं।
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वेनेजुएला पर नजर और तेल का खेल

अमेरिका की नजर वेनेजुएला के तेल भंडार पर भी है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। वहां चीन का बड़ा निवेश है। अमेरिका ने वहां हस्तक्षेप करके तेल कारोबार को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की है। इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में ही हो। तेल व्यापार पर कब्जा रखकर अमेरिका अपनी करेंसी की मांग बनाए रखना चाहता है।

आम जनता क्या सोचती है?

इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल पर आम लोगों की भी राय स्पष्ट है। राजेश कुमार चौहान का मानना है कि ट्रंप तानाशाही रवैया अपना रहे हैं। उनका कहना है कि दुनिया को अमेरिका के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, भले ही थोड़ा नुकसान सहना पड़े।
मीना धानिया कहती हैं कि डॉलर ही अमेरिका को भू-राजनीतिक लाभ देता है। इसी के दम पर वह दूसरे देशों पर प्रतिबंध लगाता है। वहीं, ओमप्रकाश पासवान का कहना है कि डी-डॉलराइजेशन से दुनिया में संतुलन आएगा। इससे विकासशील देशों को नए अवसर मिलेंगे। यह बदलाव धीरे होगा, लेकिन दुनिया के लिए अच्छा साबित होगा।

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