New Delhi: ईरान में रजा पहलवी की वापसी की चर्चाओं के बीच एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 1979 की इस्लामी क्रांति ने अनजाने में भारत को बड़ा फायदा पहुँचाया। अयातुल्ला खामेनेई की कट्टरपंथी विचारधारा ने पाकिस्तान को कश्मीर के बजाय अपनी ही सुरक्षा में उलझा दिया। इतिहास गवाह है कि ईरान की इस क्रांति ने पड़ोसी मुल्क में वैचारिक आग लगा दी। इसने भारत के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम किया।
पाकिस्तान बना शिया-सुन्नी जंग का अखाड़ा
भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ पाकिस्तान की आंतरिक कलह रही। साल 1979 के बाद वहां के हालात तेजी से बदले। जनरल जिया-उल-हक ने भारत के खिलाफ जेहाद के लिए वहाबी विचारधारा को बढ़ावा दिया। ईरान की शिया क्रांति ने इसे सीधी चुनौती दी। ईरान ने वहां शिया संगठनों का समर्थन किया तो जवाब में सऊदी अरब ने सुन्नी गुट खड़े कर दिए।
नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान की सड़कें जंग का मैदान बन गईं। कराची से लेकर लाहौर तक हिंसा भड़क उठी। जो बंदूकें और संसाधन भारत की ओर मुड़ने थे, वे आपस में ही एक-दूसरे पर चलने लगे। यह भारत के लिए एक बड़ी राहत साबित हुई।
कश्मीर पर पकड़ हुई ढीली
नब्बे के दशक में सोवियत संघ की वापसी के बाद मुजाहिदीन कश्मीर भेजे गए थे। यह भारत के लिए मुश्किल दौर था। लेकिन साल 2000 के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। पाकिस्तान जिस सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दे रहा था, वह उसी के लिए मुसीबत बन गई।
बलूचिस्तान और वजीरिस्तान में अस्थिरता बढ़ने लगी। तालिबान के उभार ने पाकिस्तान की सेना को पश्चिमी सीमा पर व्यस्त कर दिया। अपनी ही आग बुझाने के चक्कर में सेना कश्मीर पर पूरा जोर नहीं लगा सकी। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, दुश्मन का अपनी ही बीमारी से लड़ना भारत के लिए रणनीतिक जीत जैसा रहा।
शाह और अयातुल्ला का अलग रुख
इतिहास बताता है कि ईरान के पूर्व शाह पाकिस्तान के बेहद करीबी दोस्त थे। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्धों में इस्लामाबाद की मदद भी की थी। लेकिन 1979 की क्रांति ने सारे समीकरण पलट दिए। कट्टरपंथी होने के बावजूद खामेनेई ने कभी इस्लामाबाद के साथ मिलकर सुन्नी इस्लामिक फ्रंट नहीं बनाया। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती गई। इसी अविश्वास ने भारत के लिए चाबहार पोर्ट जैसे रास्ते खोल दिए।
बयान तीखे, लेकिन रिश्ते मजबूत
अयातुल्ला खामेनेई ने कई मौकों पर भारत के खिलाफ बयान दिए। उन्होंने कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर नई दिल्ली की आलोचना भी की। लेकिन कूटनीति का असली खेल बयानों से अलग था। तेहरान ने अपनी ‘इस्लामिक इमेज’ बचाने के लिए भारत को निशाना बनाया, पर पाकिस्तान का साथ नहीं दिया।
ईरान ने हमेशा भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता दी। अब 2026 में ईरान में बदलाव की बयार बह रही है। भारत को नई चुनौतियों के लिए सतर्क रहना होगा। इतिहास याद रखेगा कि ईरान की क्रांति भारत के लिए एक अनचाहा जैकपॉट साबित हुई।
