International News: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिकी बलों द्वारा गिरफ्तारी ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे एक बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि यह अवैध आप्रवासन और ड्रग तस्करी को बढ़ावा देने वाली सरकार का अंत है। लेकिन भू-राजनीतिक विश्लेषक इस घटना को अलग नजरिये से देख रहे हैं।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना अमेरिका की रणनीतिक हार साबित हो सकती है। इसके पीछे रूस और चीन की असममित रणनीति को कारण बताया जा रहा है। यह घटना भारत जैसे देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आई है। अमेरिकी विदेश नीति के उपकरण अब स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
अमेरिकी जीत या रणनीतिक चुनौती
ट्रम्प प्रशासन मादुरोकी गिरफ्तारी को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। लेकिन विश्लेषक इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। वेनेजुएला लंबे समय से अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में रहा है। मादुरो ने समाजवादी नीतियों का पालन किया और तेल क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण किया।
इसने अमेरिकी हितों के साथ सीधा टकराव पैदा किया। पिछले सात वर्षों में अमेरिका ने वेनेजुएला पर भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाए। सैन्य दबाव और राजनयिक कोशिशें भी जारी रहीं। इन सभी उपायों ने अमेरिकी संसाधनों पर दबाव डाला।
रूस और चीन की भूमिका पर प्रकाश
विशेषज्ञ मानतेहैं कि रूस और चीन ने मादुरो सरकार का समर्थन एक रणनीति के तहत किया। उनका उद्देश्य अमेरिका को लैटिन अमेरिका में उलझाए रखना था। यह एक असममित रणनीति का हिस्सा थी जहां वेनेजुएला एक मोहरा बन गया। रूस और चीन के लिए मादुरो को समर्थन देना सस्ता विकल्प था।
वहीं अमेरिका को इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। आर्थिक प्रतिबंधों से वैश्विक बाजार प्रभावित हुए। राजनयिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा इस मामले में लगा दिया गया। इस तरह रूस और चीन ने अमेरिका को एक जटिल समस्या में उलझा दिया।
अमेरिकी विदेश नीति के तीन उपकरण
वेनेजुएलाकी घटना ने अमेरिकी विदेश नीति के मुख्य उपकरणों को उजागर किया है। पहला उपकरण सैन्य बल का प्रयोग है जैसा कि वेनेजुएला में देखा गया। दूसरा उपकरण आर्थिक प्रतिबंध हैं जो देश को कमजोर करने के लिए लगाए जाते हैं। तीसरा उपकरण वैधता समाप्त करना है।
वैधता समाप्त करने का अर्थ है किसी सरकार को अलोकतांत्रिक या अवैध घोषित करना। अमेरिका इन तीनों उपकरणों का उपयोग अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए करता है। यह दृष्टिकोण छोटे और मध्यम शक्ति वाले देशों के लिए चुनौती पैदा करता है।
भारत के संदर्भ में क्या है स्थिति
भारत केमामले में अमेरिका के पहले दो उपकरण प्रभावी नहीं हो सकते। भारत और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। प्रतिबंध दोनों देशों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। सैन्य बल का विकल्प भी व्यावहारिक नहीं है क्योंकि भारत एक शक्तिशाली सैन्य शक्ति है।
इसलिए विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका तीसरे उपकरण का उपयोग कर सकता है। इसके तहत सरकार की वैधता पर सवाल उठाने का प्रयास किया जा सकता है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों और रिपोर्टों के माध्यम से यह प्रयास देखा जा सकता है।
नैरेटिव युद्ध और भारत
पिछलेकुछ वर्षों में भारत के खिलाफ एक नैरेटिव युद्ध देखा गया है। इसमें लोकतांत्रिक सूचकांक और मानवाधिकार रिपोर्ट्स का उपयोग किया गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और थिंक टैंक्स द्वारा विशेष नैरेटिव को बढ़ावा दिया गया है। इसका उद्देश्य भारत की छवि को प्रभावित करना प्रतीत होता है।
विशेषज्ञ इस प्रक्रिया को डी-लेजिटिमाइजेशन का हिस्सा मानते हैं। इसके तहत किसी देश की सरकार की वैधता पर संदेह पैदा किया जाता है। यह रणनीति अप्रत्यक्ष दबाव बनाने का काम करती है। भारत में इस पर सतर्कता और विश्लेषण की आवश्यकता है।
भारत की मजबूत स्थिति
भारत कीस्थिति वेनेजुएला से बिल्कुल अलग है। भारत एक स्थापित लोकतंत्र है जिसकी अर्थव्यवस्था मजबूत है। देश की सैन्य शक्ति और सामरिक महत्व भी उल्लेखनीय है। अमेरिका को चीन के मुकाबले में भारत की साझेदारी की आवश्यकता है।
इसलिए सीधे टकराव की संभावना कम है। लेकिन अप्रत्यक्ष दबाव और नैरेटिव निर्माण जारी रह सकता है। भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखते हुए सतर्क रहने की आवश्यकता है। वैश्विक भू-राजनीति में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

