शराब नीति केस में नया बवाल! मंत्री सौरभ भारद्वाज का बड़ा दावा- सॉलिसिटर जनरल जज के बच्चों को देते हैं केस, इसलिए जताया निष्पक्षता पर संदेह

Delhi News: दिल्ली शराब नीति मामले में कानूनी खींचतान के बीच अब न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर हितों के टकराव के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने उन कारणों को सार्वजनिक किया जिनकी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाई कोर्ट में जस्टिस शर्मा की पीठ से मामला हटाने की मांग की थी। ये आरोप न्यायिक प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ सकते हैं।

हितों के टकराव का सीधा आरोप

सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल ने अदालत में दस मुख्य बिंदु रखे थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हितों के टकराव का था। उन्होंने दावा किया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे यानी बेटा और बेटी पेशे से वकील हैं। दोनों ही केंद्र सरकार के विधि पैनल में शामिल हैं और अक्सर केंद्र की ओर से अदालतों में पेश होते हैं। इसी आधार पर निष्पक्षता पर संदेह जताया गया था।

तुषार मेहता पर केस असाइनमेंट को लेकर उठे सवाल

भारद्वाज ने आरोपों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकारी पैनल में बहुत से वकील होते हैं। लेकिन यह तय करना कि किस वकील को कौन सा केस दिया जाएगा, यह अधिकार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के पास होता है। उन्होंने कहा कि तुषार मेहता ही वर्तमान में शराब नीति मामले में केंद्र सरकार, सीबीआई और ईडी की तरफ से पैरवी कर रहे हैं। यह संयोग गंभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि केस देने वाला ही एक पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

वित्तीय लाभ का मुद्दा बना अहम

दिल्ली के मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से मिलने वाले ये मुकदमे मुफ्त नहीं होते हैं। इन केसों को लड़ने के एवज में वकीलों को भारी भरकम फीस और वित्तीय लाभ मिलता है। भारद्वाज का कहना था कि जब एक तरफ सॉलिसिटर जनरल केजरीवाल के खिलाफ अदालत में खड़े हैं और दूसरी तरफ वही जज के परिवार को आर्थिक रूप से लाभान्वित कर रहे हैं तो यह स्थिति न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। यह एक रीजनेबल अप्रहेंशन पैदा करता है।

केजरीवाल के हलफनामे का किया जिक्र

सौरभ भारद्वाज ने बताया कि अरविंद केजरीवाल ने खुद भरी अदालत में हलफनामा दाखिल कर यह बात रखी थी। उनका कहना था कि जो सॉलिसिटर जनरल एक पक्ष से जुड़े हैं वही जज के बच्चों को लगातार काम दे रहे हैं। ऐसे में एक उचित आशंका बनती है कि क्या कोर्ट तुषार मेहता की दलीलों से प्रभावित हुए बिना पूरी तरह निष्पक्ष रह पाएगी। केजरीवाल ने इसी को आधार बनाकर बेंच से मामला हटाने की विनती की थी।

इनकार न किए जा सकने वाले तथ्य

मंत्री ने अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये कोई राजनीतिक आरोप या मनगढ़ंत कहानी नहीं है। उन्होंने इसे ऐसे तथ्य करार दिया जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। उनका आरोप है कि पैनल के अन्य वकीलों की तुलना में जस्टिस शर्मा के बेटे को असामान्य रूप से बहुत ज्यादा मुकदमे आवंटित किए जाते हैं। भारद्वाज ने कहा कि जनता अब इन सब चीजों को समझने लगी है और वह देख रही है कि व्यवस्था में कहां फर्क पड़ता है और कहां नहीं।

शराब नीति मामले में बढ़ी सियासी गर्मी

दिल्ली शराब नीति से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता पहले ही केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर हैं। ऐसे में जस्टिस शर्मा को लेकर उठाए गए इन सवालों ने इस कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ जोड़ दिया है। हालांकि हाई कोर्ट ने पहले ही केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें बेंच बदलने की मांग की गई थी। अब सौरभ भारद्वाज के इस खुलासे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस

भारद्वाज के इस बयान ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। हालांकि अदालत की अवमानना से बचने के लिए उन्होंने अपने शब्दों का चयन सावधानी से किया। उन्होंने सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संदेह जताया है। यह रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि मामले को कानूनी दायरे में रखते हुए जनता की अदालत में अपनी बात पहुंचाई जा सके। फिलहाल इस मामले पर केंद्र सरकार या सॉलिसिटर जनरल की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। जस्टिस शर्मा की बेंच इस केस की सुनवाई कर रही है और अगली तारीख पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।शराब नीति केस में नया बवाल! मंत्री सौरभ भारद्वाज का बड़ा दावा- सॉलिसिटर जनरल जज के बच्चों को देते हैं केस, इसलिए जताया निष्पक्षता पर संदेह

कीवर्ड्स: Delhi liquor policy, Arvind Kejriwal

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Delhi News: दिल्ली शराब नीति मामले में कानूनी खींचतान के बीच अब न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर हितों के टकराव के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने उन कारणों को सार्वजनिक किया जिनकी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाई कोर्ट में जस्टिस शर्मा की पीठ से मामला हटाने की मांग की थी। ये आरोप न्यायिक प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ सकते हैं।

हितों के टकराव का सीधा आरोप

सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल ने अदालत में दस मुख्य बिंदु रखे थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हितों के टकराव का था। उन्होंने दावा किया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे यानी बेटा और बेटी पेशे से वकील हैं। दोनों ही केंद्र सरकार के विधि पैनल में शामिल हैं और अक्सर केंद्र की ओर से अदालतों में पेश होते हैं। इसी आधार पर निष्पक्षता पर संदेह जताया गया था।

तुषार मेहता पर केस असाइनमेंट को लेकर उठे सवाल

भारद्वाज ने आरोपों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकारी पैनल में बहुत से वकील होते हैं। लेकिन यह तय करना कि किस वकील को कौन सा केस दिया जाएगा, यह अधिकार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के पास होता है। उन्होंने कहा कि तुषार मेहता ही वर्तमान में शराब नीति मामले में केंद्र सरकार, सीबीआई और ईडी की तरफ से पैरवी कर रहे हैं। यह संयोग गंभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि केस देने वाला ही एक पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

वित्तीय लाभ का मुद्दा बना अहम

दिल्ली के मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से मिलने वाले ये मुकदमे मुफ्त नहीं होते हैं। इन केसों को लड़ने के एवज में वकीलों को भारी भरकम फीस और वित्तीय लाभ मिलता है। भारद्वाज का कहना था कि जब एक तरफ सॉलिसिटर जनरल केजरीवाल के खिलाफ अदालत में खड़े हैं और दूसरी तरफ वही जज के परिवार को आर्थिक रूप से लाभान्वित कर रहे हैं तो यह स्थिति न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। यह एक रीजनेबल अप्रहेंशन पैदा करता है।

केजरीवाल के हलफनामे का किया जिक्र

सौरभ भारद्वाज ने बताया कि अरविंद केजरीवाल ने खुद भरी अदालत में हलफनामा दाखिल कर यह बात रखी थी। उनका कहना था कि जो सॉलिसिटर जनरल एक पक्ष से जुड़े हैं वही जज के बच्चों को लगातार काम दे रहे हैं। ऐसे में एक उचित आशंका बनती है कि क्या कोर्ट तुषार मेहता की दलीलों से प्रभावित हुए बिना पूरी तरह निष्पक्ष रह पाएगी। केजरीवाल ने इसी को आधार बनाकर बेंच से मामला हटाने की विनती की थी।

इनकार न किए जा सकने वाले तथ्य

मंत्री ने अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये कोई राजनीतिक आरोप या मनगढ़ंत कहानी नहीं है। उन्होंने इसे ऐसे तथ्य करार दिया जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। उनका आरोप है कि पैनल के अन्य वकीलों की तुलना में जस्टिस शर्मा के बेटे को असामान्य रूप से बहुत ज्यादा मुकदमे आवंटित किए जाते हैं। भारद्वाज ने कहा कि जनता अब इन सब चीजों को समझने लगी है और वह देख रही है कि व्यवस्था में कहां फर्क पड़ता है और कहां नहीं।

शराब नीति मामले में बढ़ी सियासी गर्मी

दिल्ली शराब नीति से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता पहले ही केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर हैं। ऐसे में जस्टिस शर्मा को लेकर उठाए गए इन सवालों ने इस कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ जोड़ दिया है। हालांकि हाई कोर्ट ने पहले ही केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें बेंच बदलने की मांग की गई थी। अब सौरभ भारद्वाज के इस खुलासे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस

भारद्वाज के इस बयान ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। हालांकि अदालत की अवमानना से बचने के लिए उन्होंने अपने शब्दों का चयन सावधानी से किया। उन्होंने सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संदेह जताया है। यह रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि मामले को कानूनी दायरे में रखते हुए जनता की अदालत में अपनी बात पहुंचाई जा सके। फिलहाल इस मामले पर केंद्र सरकार या सॉलिसिटर जनरल की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। जस्टिस शर्मा की बेंच इस केस की सुनवाई कर रही है और अगली तारीख पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

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