New Delhi News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से खाद्य तेल का उपयोग कम करने की बेहद अहम अपील की है। यह सिर्फ फिट रहने का कोई साधारण मंत्र नहीं है। इसके पीछे देश को गंभीर बीमारियों और आर्थिक संकट की दोहरी तबाही से बचाने की एक बड़ी रणनीति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमें साल भर में सिर्फ 12 से 13 किलो तेल खाना चाहिए। लेकिन आज हर भारतीय औसतन 20 किलो से ज्यादा तेल खा रहा है। यह बहुत खतरनाक स्थिति है।
खतरे के निशान को पार करती खपत
भारत में खाद्य तेल की खपत पिछले छह दशकों में कई गुना बढ़ चुकी है। साल 1960-61 में एक भारतीय साल भर में केवल 3.2 किलो तेल खाता था। साल 2000 तक यह आंकड़ा बढ़कर 8.2 किलो हो गया। अब यह खपत 20 किलो को भी पार कर चुकी है। अगर हमने यही रफ्तार जारी रखी, तो साल 2028 तक प्रति व्यक्ति खपत 25 किलो हो जाएगी। वहीं साल 2038 तक यह 40 किलो तक पहुंच सकती है, जो जानलेवा साबित होगी।
ज्यादा तेल खाने का सीधा और बुरा असर हमारी सेहत पर तेजी से पड़ रहा है। देश भर में हार्ट अटैक, बढ़ता मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारियां बहुत आम हो गई हैं। सबसे बड़ी चिंता पाम ऑयल के भारी उपयोग को लेकर है। इस तेल में सैचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत अधिक होती है। डॉक्टर भी इसे दिल की सेहत के लिए बेहद खतरनाक मानते हैं। इसके लगातार सेवन से नसों में ब्लॉकेज का खतरा काफी बढ़ जाता है।
विदेशी आयात पर देश की भारी निर्भरता
खराब सेहत के साथ-साथ बढ़ती खपत अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ रही है। आज भारत अपनी जरूरत का 57 प्रतिशत खाद्य तेल दूसरे देशों से खरीदता है। हमें तेल मंगाने पर हर साल डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं। साल 2022-23 में देश की कुल खपत 292 लाख टन थी। लेकिन घरेलू उत्पादन सिर्फ 126.9 लाख टन रहा। इस बड़ी कमी को पूरा करने के लिए 165 लाख टन तेल का भारी आयात करना पड़ा।
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़े स्थिति की गंभीरता को साफ तौर पर दर्शाते हैं। भारत ने साल 2022-23 में ही 103.9 लाख टन सिर्फ पाम ऑयल का आयात किया। इसके अलावा 39.6 लाख टन सोयाबीन का तेल और 21.45 लाख टन सूरजमुखी का तेल विदेशों से खरीदा गया। यह विशाल आयात बिल हमारी विदेशी मुद्रा भंडार पर एक बहुत बड़ा बोझ डालता है। इसलिए इस आयात को कम करना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गया है।
आत्मनिर्भरता की ओर सरकार के बड़े कदम
इस भारी आयात को रोकने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन की शुरुआत की है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य देश को तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है। इसके तहत देश भर में तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले बीज दिए जा रहे हैं। खाली पड़ी परती जमीन पर भी तिलहन की खेती को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि घरेलू बाजार में तेल की पैदावार तेजी से बढ़ सके।
आयात को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने कड़े आर्थिक फैसले भी लिए हैं। कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क 5.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 16.5 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं रिफाइंड खाद्य तेलों पर यह शुल्क 35.75 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया है। इस बड़े बदलाव से भारतीय किसानों को उनकी तिलहन फसल की बेहतर कीमत मिलेगी। साथ ही विदेशी तेल पर हमारी निर्भरता कम होगी। बेहतर सेहत के लिए अब हमें अपनी खानपान की आदतें बदलनी होंगी।


