माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने के बाद भारतीय पर्वतारोही की दर्दनाक मौत, अब हमेशा के लिए वहीं रहेगा पार्थिव शरीर

Telangana News: हैदराबाद के रहने वाले 53 वर्षीय टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी ने पिछले हफ्ते दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एवरेस्ट फतह कर नीचे उतरते समय शिखर से महज 60 मीटर नीचे हिलैरी स्टेप के पास उनकी दर्दनाक मौत हो गई।

इस दुखद हादसे के बाद अब उनके परिवार ने एक बेहद भावुक और बड़ा फैसला लिया है। परिजनों ने तय किया है कि अरुण कुमार का पार्थिव शरीर अब हमेशा के लिए एवरेस्ट की बर्फीली वादियों में ही रहेगा। इस फैसले ने देश के तमाम खेल प्रेमियों और पर्वतारोहियों को झकझोर कर रख दिया है।

परिवार ने आखिरकार क्यों लिया शव को वहीं छोड़ने का कठिन फैसला

अरुण के परिवार के इस कड़े फैसले के पीछे दो मुख्य और बेहद ठोस कारण सामने आए हैं। पहला कारण तो यह है कि अरुण का पहाड़ों और प्रकृति के प्रति बेहद गहरा लगाव था। दूसरा सबसे बड़ा व्यावहारिक कारण यह है कि इतनी भीषण ऊंचाई से किसी भी शव को सुरक्षित नीचे लाना लगभग पूरी तरह नामुमकिन होता है।

पर्वतारोहण का संचालन करने वाली प्रसिद्ध एजेंसी ‘पायनियर एडवेंचर’ ने शुरुआत में इस कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन का खर्च करीब 1.1 करोड़ रुपये यानी 114,000 डॉलर बताया था। बाद में एजेंसी ने इसे घटाकर लगभग 90 लाख रुपये (94,000 डॉलर) किया। यह सामान्य रूप से एवरेस्ट पर चढ़ने के कुल खर्च से दोगुनी से भी ज्यादा बड़ी रकम है।

जानिए क्या होता है एवरेस्ट का खतरनाक डेथ जोन

समुद्र तल से 8,000 मीटर से ऊपर के बेहद खतरनाक हवाई क्षेत्र को पर्वतारोहण की दुनिया में ‘डेथ जोन’ कहा जाता है। इस जानलेवा इलाके में ऑक्सीजन की अत्यधिक कमी होती है। साथ ही यहां हाड़ कंपा देने वाली हाशिए की ठंड पड़ती है। इस बर्फीले नरक से किसी भी शव को बाहर निकालना बेहद जटिल काम है।

बर्फ में पूरी तरह से जम चुके इंसानी शव को कुल्हाड़ी से काटकर बाहर निकालना पड़ता है। इस जोखिम भरे काम के लिए 8 से 10 बेहद अनुभवी शेरपाओं को कई दिनों तक मौत के साए में वहां रुकना पड़ता। इसके बाद भारी शव को रस्सियों के सहारे बांधकर वापस कैंप तक लाना होता है।

शेरपाओं की जान को भी बना रहता है सीधा खतरा

शव को बांधकर लगातार हिमस्खलन की आशंका वाले बेहद खतरनाक रास्तों से गुजरना पड़ता है। शेरपाओं को भारी जोखिम उठाकर इसे 6,400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैंप II तक लाना पड़ता। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान अनुभवी शेरपाओं की अपनी जान को भी सीधा और बड़ा खतरा बना रहता है।

मौसम के पल-पल बदलते मिजाज के कारण पर्वतारोहण एजेंसियां भी इतने ऊंचे स्थानों पर शवों को निकालने की सलाह नहीं देती हैं। यही वजह है कि परिवार ने भारी मन से अरुण के पार्थिव शरीर को एवरेस्ट की चोटी पर ही अनंत शांति के साथ विश्राम करने देने का यह अंतिम फैसला लिया है।

Author: Srinivas Rao

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