आखिर कब सुरक्षित होगी देश की बेटियां -राजेश माहेश्वरी

देश में बेटियों की सुरक्षा को लेकर भले ही तमाम बातें की जाएं लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। आए दिन मीडिया के माध्यम से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों, अपराधों और यौन हमलों के समाचार सुनने-पढऩे को मिलते रहते हैं। ताजा मामला मुम्बई की ‘निर्भया’ का है। वास्तव में यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि घर से बाहर बेटियां असुरक्षित हैं और लगातार अमानवीय क्रूरता और हिंसा का शिकार हो रही हैं।

वर्ष 2012 में निर्भया कांड ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। उसके बाद यौन हिंसा से जुड़े कानूनों को सख्त बनाया गया था। दोषियों को कठोरतम सजा से दंडित भी किया गया था, लेकिन लगता है कि दिल्ली की निर्भया का बलिदान व्यर्थ चला गया। मुंबई की घटना के बाद ऐसा लगता है मानो स्थितियों में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है। ऐसे में सवाल यह है कि अपराधियों में कानून का भय क्यों नहीं है? क्यों बेटियों के विरुद्ध यौन अपराध की घटनाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं? असल में अपराधियों में यह धारणा घर कर चुकी है कि वे अपराध करने के बाद भी बच जाएंगे। हमें इस पर गंभीरता से सोचना होगा। क्या अपराधी की परवरिश में कहीं खोट है या हमारा वातावरण इतना जहरीला हो चला है कि वह लगातार ऐसे अपराधी पैदा कर रहा है?

26 जून, 2018 को जारी थॉमसन रॉयटर्स फाऊंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार निर्भया कांड के बाद सरकार ने इस समस्या से निपटने का संकल्प लिया था, लेकिन भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कोई कमी नहीं आई। 2018 का सर्वे बताता है कि भारत तीन वजहों- यौन हिंसा, सांस्कृतिक-धार्मिक कारण और मानव तस्करी के चलते महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। 2018 में भारत में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ यौन हिंसा के मामले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए। जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में 8 साल की बच्ची और झारखंड में मानव तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने वाली सामाजिक कार्यकत्र्ता के साथ बलात्कार की खबरें दुनिया भर में चर्चा का विषय बनीं।

दिसंबर 2017 को इंडियास्पैंड की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के प्रति घंटा औसतन 39 मामले दर्ज किए गए। साल 2007 में यह संख्या मात्र 21 थी। सरकार ने प्रतिक्रिया में बलात्कारियों के लिए सजा कड़ी करने और बच्चों के साथ बलात्कार करने वाले को मौत की सजा देने का ऐलान किया। राष्ट्रीय अपराध रिकर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के आंकड़े भी महिलाओं के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में वृद्धि को स्पष्ट करते हैं। इन अपराधों में बलात्कार, घरेलू हिंसा, मारपीट, दहेज प्रताडऩा, एसिड हमला, अपहरण, मानव तस्करी, साइबर अपराध और कार्यस्थल पर उत्पीडऩ आदि शामिल हैं। साल 2015 में बलात्कार के 34,651, 2016 में 38,947 मामले दर्ज किए गए। एन.सी.आर.बी. की रिपोर्ट बताती है कि 2017 में भारत में कुल 32,559 बलात्कार हुए, जिनमें 93$1 फीसदी आरोपी करीबी ही थे।

कुछ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में बलात्कार की एक घटना और क्रूरता के बाद पुलिस पर अपराधियों के साथ बंदूक से न्याय करने का दबाव बना था। बाद में जब बलात्कारी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे तो महिलाओं ने पुलिस का अभिनंदन किया था।
यह दर्शाता है कि आम धारणा बन रही है कि न्यायिक प्रक्रिया से संगीन अपराधियों को समय रहते समुचित दंड नहीं मिल पाता।

इसमें दो राय नहीं है कि आज भी पीड़ित महिला व परिजनों को न्याय पाने के लिए यातनादायक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। देश ने देखा था कि निर्भया कांड के दोषी सजा होने के बाद भी कानूनी दाव-पेंचों का सहारा लेकर पुलिस-प्रशासन व न्याय व्यवस्था को छका रहे थे। इस घटनाक्रम ने शीघ्र न्याय की आस में बैठे लोगों को व्यथित किया था। वहीं यौन अपराधों का आंकड़ा चौंकाने वाले स्तर तक बढ़ा है। यौन हिंसा के बाद तब तक मामला सुर्खियों में रहता है जब तक राजनीतिक दल राजनीति करते रहते हैं और मीडिया में मामला गर्म रहता है। फिर यौन पीड़िता का शेष जीवन सामाजिक लांछनों और हिकारत की त्रासदी के बीच गुजरता है।

दरअसल, सत्ताधीश भी कोई गंभीर पहल नहीं करते जो पीड़ितों का दर्द बांट सके और जांच व न्याय प्रक्रिया में तेजी लाकर नजीर पेश कर सके। इससे आपराधिक तत्वों को खेलने का मौका मिलता है। भारत में महिलाओं पर हमलावरों की मानसिकता का अध्ययन करने, समझने और उसमें बदलाव लाने के प्रयास बहुत कम होते हैं। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा से निपटने का समग्र दृष्टिकोण अपराधियों के व्यवहार में बदलाव लाने के गंभीर प्रयासों के बगैर कभी पूरा नहीं हो सकता। बलात्कार की घटनाओं में धीरे-धीरे कुछ हद तक कमी लाई जा सकती है यदि हम (सभी) महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ पुरुष मानवीयकरण के लक्ष्य को भी सामने रखें। घर में पिता पत्नी व बेटी का और बेटा मां व बहन का सम्मान करे। इसी तरह पुरुष घर से बाहर किसी भी स्त्री का इंसान की तरह सम्मान करे।

केंद्र सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं के लिए अपने स्तर पर वर्ष 2013 में निर्भया कोष की स्थापना की थी। हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता के लिए चिकित्सकीय, कानूनी और मनोवैज्ञानिक सेवाआें की एकीकृत रेंज तक उनकी पहुंच सुगम बनाने के लिए वन-स्टॉप सैंटर्स की शुरूआत की गई। अब तक, 150 से ज्यादा वन-स्टप सैंटर्स शुरू किए जा चुके हैं। ‘महिलाओं की हैल्पलाइन का सार्वजनीकरण’ योजना का उद्देश्य हिंसा से पीड़ित महिला को रैफरल के माध्यम से 24 घंटे तत्काल और आपात राहत पहुंचाना है। इन कदमों के नतीजे भी सामने आने लगे हैं लेकिन वे तब तक इस समस्या का समाधान करने में समर्थ नहीं हो सकेंगे, जब तक हम व्यवहार में बदलाव लाने की अनवरत प्रक्रिया की शुरूआत नहीं करेंगे।

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