अदालत में वकील से प्रतिनिधित्व करवाना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा; सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी मामले में वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके साथ ही कोर्ट ने इलहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को रद कर दिया। हाई कोर्ट ने 1987 के एक हत्या मामले में एक व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने कहा था कि उसका वकील सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट व्यक्ति के अपील को बहाल कर दी है और हाई कोर्ट से जल्दी किसी तारीख पर मामले को लेकर सुनवाई करने के लिए विचार करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने मामले किसी वकील द्वारा मामले में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधिनत्व नहीं करने पर अदालत मित्र (एमीकस क्यूरी) नियुक्त करने का आदेश दिया है। 

जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वकील के जरिए प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। यह पूरी तरह से स्वीकार्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत इसका अधिकार है। इस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति विनीत सरण और न्यायमूर्ति एस रविंद्र भट भी शामिल हैं। 

पीठ ने 18 दिसंबर के अपने आदेश में कहा कि मामले में आरोपी का प्रतिनिधित्व कर रहा वकील किसी वजह से उपलब्ध नहीं है तो अदालत अपनी सहायता के लिए एमीकस क्यूरी नियुक्त करने के लिए आजाद है, लेकिन किसी मामले में ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई उसका  प्रतिनिधित्व न कर रहा हो। इलहाबाद हाई कोर्ट के अप्रैल 2017 में सुनाए गए फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया।  सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश किया कि अपील को निर्देशों के लिए 11 जनवरी 2021 को उचित अदालत के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा है कि अपील लंबित रहने तक अपील करने वाले शख्स को हिरासत में रखा जा सकता है।

मामले में एक अन्य आरोपी के साथ उस व्यक्ति को हत्या के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट के समक्ष उनकी अपील लंबित होने के दौरान एक की मृत्यु हो गई थी और उससे संबंधित कार्यवाई समाप्त कर दी गई थी।

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