अमृतसर से 6 बार सांसद रहे रघुनंदन लाल भाटिया का कोरोना से निधन, 1984 के दंगों में निभाई में अहम भूमिका

कांग्रेस में वटवृक्ष का रुतबा रखने वाले पूर्व विदेश राज्यमंत्री बाबा बोहड़ रघुनंदन लाल भाटिया का शनिवार सुबह कोरोना से निधन हो गया। वह 100 साल के थे और पिछले काफी समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे। 3 जुलाई 1921 को जन्मे भाटिया पंजाब के अमृतसर जिले से 6 बार सांसद रहे।

वे केरल और बिहार के राज्यपाल रहे। 23 जून 2004 से 10 जुलाई 2008 तक वह केरल और 10 जुलाई 2008 से लेकर 28 जून 2009 तक बिहार के राज्यपाल रहे। भाटिया 1992 में पीवी नरसिम्हा की सरकार में विदेश राज्यमंत्री भी रहे। भाटिया सियासत में अपनी साफ सुथरी छवि के लिए जाने जाते थे।

भाटिया ने अपने भाई दुर्गा दास भाटिया के निधन के बाद सियासत में कदम रखा था। कांग्रेस ने रघुनंदन लाल भाटिया को उपचुनाव में मैदान में उतारा। भाटिया ने यज्ञ दत्त शर्मा को हराया। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में तत्कालीन जनता पार्टी के उम्मीदवार डॉ. बलदेव प्रकाश ने रघुनंदन लाल भाटिया को मात दी। 1980 के लोकसभा चुनाव में रघुनंदन लाल भाटिया ने भाजपा के डॉ. बलदेव प्रकाश को शिकस्त दी।

1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार और दिल्ली दंगों के बावजूद रघुनंदन लाल भाटिया चुनाव जीत गए थे। 1989 चुनाव के दौरान प्रदेश में आतंक की काली परछाई बहुत गहरी थी, तब चीफ खालसा दीवान के तत्कालीन प्रधान किरपाल सिंह बतौर आजाद उम्मीदवार मैदान में उतरे और आरएल भाटिया को हराया। 1991 और 1996 के चुनाव में भी भाटिया को जीत मिली। अमृतसर से 1952 में ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर पहले जट सिख उम्मीदवार थे।

इसके लगभग 31 साल बाद 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने एक शहरी सिख दया सिंह सोढ़ी को चुनाव मैदान में उतारा। सोढ़ी ने आरएल भाटिया के वर्चस्व को तोड़ते हुए यह सीट जीती। 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब प्रदेश में अकाली-भाजपा की सरकार थी, तब दया सिंह सोढ़ी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की कार्यप्रणाली पर बयान दिए। सोढ़ी उस चुनाव में नहीं जीत पाए।

लंबे समय तक चले भाटिया के एकछत्र राज को नवजोत सिंह सिद्धू ने ध्वस्त किया। भारतीय जतना पार्टी के टिकट पर सिद्धू ने 2004, उपचुनाव 2007 व 2009 तक लगातार जीत दर्ज करते हुए हैट्रिक बनाई।

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