जस्टिस अशोक भूषण रिटायरमेंट से चार दिन पहले गए छुट्टी पर, रामजन्म भूमि केस में लिखा था परिशिष्ट

Delhi News: जस्टिस अशोक भूषण ने अपनी रिटायरमेंट की तिथि से चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट को अलविदा कह दिया। शीर्ष अदालत में बुधवार उनका आखिरी दिन था। अयोध्या विवाद पर पांच जजों की बेंच की तरफ से दिए गए फैसले का परिशिष्ट लिखने वाले जस्टिस अशोक भूषण ‘वकीलों के पसंदीदा जज’ के तौर पर जाना जाते रहे।

रिटायरमेंट से चार दिन पहले क्यों ले ली छुट्टी?
दरअसल, जस्टिस अशोक भूषण ने अपनी मां के श्राद्ध कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए रिटायरमेंट से चार दिन पहले ही छुट्टी ले ली। उनकी मां का नौ दिन पहले देहांत हो गया था। जस्टिस भूषण युवा वकीलों के प्रति दोस्ताना रवैया रखा करते थे और उनका उत्साह बढ़ाने की कोशिशें करते पाए जाते। उन्होंने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिस केस में पांच जजों की बेंच के सर्वसम्मत फैसले में 116 पन्नों का परिशिष्ट लिखा था।

व्यक्तित्व में सौम्यता और कठोरता का अनोखा मिश्रण
सुप्रीम कोर्ट में हर कोई जस्टिस भूषण को उनके सौम्य एवं मृदुभाषी जज के रूप में जानता था, लेकिन जब बारी समाज के पिछड़े और वंचित तबके की बात आती तो वो इन तबकों के पक्ष में बेलाग लपेट कठोर शब्दों का इस्तेमाल करने से कभी नहीं हिचकते। बुधवार को अपने आखिरी फैसले पर भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। मामला कोविड-19 महामारी से जान गंवाने वालों के परिजनों क मुआवजा देने का था। जस्टिस एमआर शाह के साथ उन्होंने फैसला दिया कि सरकार अपने संवैधानिक दायित्व से नहीं भाग सकती है और उसे मृतकों के परिजनों को मुआवजा देना ही होगा, भले ही वो रकम कुछ भी हो। बेंच ने यह कहते हुए कि मुआवजे की रकम चार लाख ही हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को उचित रकम तय करके गाइडलाइंस बनानी होगी।

पलायन करते मजदूरों पर फैसला
पिछले साल कोविड की पहली लहर में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद जब दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों से मजदूरों का पलायन शुरू हुआ तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। जस्टिस भूषण की अध्यक्षता वाली बेंच ने सरकार को कड़ा निर्देश दिया कि वह सैकड़ों किमी दूर अपने घरों के लिए पैदल चल पड़े लाखों मजदूरों के लिए आश्रय, भोजन और राशन का प्रबंध करे। बेंच ने सरकार से कहा कि पलायन को मजबूर मजदूरों के लिए कम्यूनिटी किचन की व्यवस्था की जाए।

इन फैसलों से भी याद किए जाएंगे जस्टिस भूषण
उन्हीं की बेंच ने एयरलाइंस कंपनियों को लॉकडाउन के कारण कैंसल की गई फ्लाइट्स के टिकटों का पैसा वापस करने का निर्देश दिया था। उन्हीं की बेंच ने सरकार और रिजर्व बैंक को मजबूर किया कि वो बैंकों को कोविड काल में लोन ईएमआई नहीं चुका पाने वालों से ब्याज नहीं वसूलने का निर्देश दें। इसी वर्ष उनकी अध्यक्षता वाली बेंच ने सामाजिक कल्याण योजनाओं का फायदा उठाने के लिए असंगठित क्षेत्र के सभी 38 करोड़ कामगारों का रजिस्ट्रेशन करने में हीला-हवाली पर सरकार की जबर्दस्त क्लास ली थी। बेंच ने सरकार के रवैये पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था कि यह ‘अक्षम्य उदासीनता’ है।

यूपी के जौनपुर में हुआ था जन्म
जस्टिस अशोक भूषण उत्तर प्रदेश के जौनपुर से हैं। 65 वर्षीय भूषण 23 वर्ष की उम्र में 1979 में लीगल प्रफेशन से जुड़े थे और 2001 में इलहाबाद हाई कोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे। 13 मई, 2016 को उनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में हुई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कुल 5 वर्ष दो महीने की सेवा दी। चीफ जस्टिस एनवी रमन ने विदाई के मौके पर जस्टिस भूषण को शानदार व्यक्तित्व का धनी कहा। उन्होंने कहा, ‘जस्टिस भूषण ने कल्याणकारी और मानवीय पहलुओं के दम पर न्याय व्यवस्था का मान बढ़ाया।’

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