एक गुड़िया थी – तृप्ता भाटिया

एक गुड़िया थी
दुःखता है! डरता है! धुआँ-धुआँ जलता है!
बस रुकता ही नहीं यह सिलसिला बलात्कार का!

चंद सिक्कों का, मगरूर, नशे और पावर में धुत्त युवाओं का जाने क्यों देश हो रहा है जाहिल कमीनो का! जो देश है वीर जवानों का।

कानून बनते रहेंगे, अदालतें चलती रहेंगी, सबूतों के अभाव रहेंगे, खरीद-फरोक्त जारी रहेगी। हले-गुले होते रहेंगे, बहुत भुलक्कड़ हैं हम, बड़े बड़े जख्म लेकर भी उभर ही आते हैं। हाँ? सही तो कहा मैने एक गुड़िया को हम भूल ही तो चुके थे। चौकीदार तो अब वोट मांगने निकले थे। रात के दस बजे! जी हाँ ! शिमला गर्मियों के दिन हैं जिदंगी चलती रहती है। सिस्टम जहाँ EVM को लेकर चौकना है बस बेटियों की फिक्र किसे? पोल तो कुछ ऐसी ही खुली है? जाइये फुकिये अस्त व्यस्त कर दीजिए! काश उस अग्नि में गुनाहगार भी जला दिया होता! तो आज यह सब दोहराया नहीं जाता! सबके मन ये बात तो है ही कि अगर गुड़िया के आरोपियों को सज़ा न हुई तो ! होंसले गुनाहगारों को ओर भी बुलन्द होंगे। सियासत लाशों के ढेरों पर तो ही हो रही, आखिर लाशें थी किस की? घर हमारे जलते हैं, लाठीचार्ज हम पर होते हैं! बच्चे भी हमारे ही घायल होते हैं और बड़े लोग तो शाम को भुने हुए काजू और व्हिस्की गिलास में उतार लेते हैं! उनके घरों की दीवारें ऊंची और सुरक्षित जो हैं, मज़ाल है कोई झांक जाए।

सवाल ये है कि भारत में न्याय के लिए सड़कों पर आना ही क्यों पड़ता है, यह धरने, कैंडल मार्च ! आखिर क्यों? क्या जिस काम की हमें जिमेवारी है, हम बिना किसी सिफारिश या निष्पक्षता से नहीं कर सकते! पर मुझे यकीन है अगर गुनाहगार का कोई रुतवा बड़ा ना हुआ तो जल्द ही पुलिस पकड़ लेगी।

सरकारें कहती है कि हमने मुजरिम पकड़ने के लिये पिंजरे रखे हैं उसमें घुसने के छेद से बड़ा छेद पीछे से निकलने के लिये है! मुजरिम इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है! पिंजडे बनाने वाले और पकड़ने वाले आपस में मिले हैं! वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और मुजरिम को छेद दिखा देते हैं! हमारे माथे पर सिर्फ पिंजरे मतलब सालों तक अदालतों के चक्कर का खर्चा चढ़ा रखा है! दुर्भग्या? इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं । चुनावों के शोर-गुल में कहीं सब दफन ना हो जाये।

-तृप्ता भाटिया

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