False Rape Case: बलात्कार के झूठे केस में छह साल बाद बरी हुआ दलित, कहा, कोई लौटा दो मेरे बीते हुए पल

6 साल तक जेल में बिताए गए समय के दौरान उसने अपनी आंखों में हजारों रंगीन सपने संजोए, उसके अरमान कुलांचे मार रहे थे, लेकिन जब हकीकत का सामना हुआ तो वह एक पल में ख्वाबों के आसमान से धरती पर उतर आया.

उसके सामने उसकी चिंतित पत्नी का चेहरा था. ‘फर्जी’ पॉक्सो मामले में बाइज्जत बरी होकर पिछले माह तिहाड़ जेल से रिहा हुए एक 55 वर्षीय दलित ने सपने देखना छोड़ दिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी की एक निचली अदालत ने पिछले माह उस व्यक्ति को यह कहते हुए बाइज्जत बरी कर दिया था कि दलित पहचान होने के कारण अभियुक्त को झूठा फंसाया गया था. अपने नाम का खुलासा न करने की शर्त रखने वाले उस दलित व्यक्ति ने भारी मन से कहा कि उसने अब सपने देखने बंद कर दिये हैं. उसने कहा, “मैं हमेशा अपने सपनों में उड़ान भरता था. अजीब बात यह है कि अब जब मुझे रिहा किया गया है, मैंने अपने सपनों में उड़ान भरना बंद कर दिया है. मैं एक बार फिर से उड़ना चाहता हूं.” अपनी मानसिक पीड़ा को किसी प्रकार काबू करते हुए उसने बताया कि एक व्यक्ति की शिकायत पर उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें उसके खिलाफ चार नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था. अभियोजन पक्ष ने उसे ‘सीरियल सेक्सुअल ऑफेंडर’ की संज्ञा दी थी. उसे 18 मई 2015 को गिरफ्तार किया गया था. गत 7 अगस्त को दिल्ली की एक अदालत ने उसने यह कहते हुए बरी कर दिया था कि दलित समुदाय के इस आरोपी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित लड़कियों के माता-पिता ने झूठे आरोप लगाये थे. आदेश सुनाए जाने की रात को ही उसे जेल से रिहा कर दिया गया था. दरअसल, दलित व्यक्ति ने बाहरी दिल्ली जिला स्थित अपने घर के सामने पालतू कुत्ते के शौच कराने का विरोध करने पर शिकायतकर्ता ने झूठी शिकायत दर्ज कराई थी.

कोर्ट ने अपने फैसले पर क्‍या कहा….
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, “तथाकथित पीड़ित लड़कियों के माता-पिता ने अपनी बेटियों को बड़ी ही निर्लज्जता पूर्वक (यौन उत्पीड़न की बातें) सिखाई थी, ताकि आरोपी के खिलाफ मामला गम्भीर और जघन्य बनाया जा सके.” अदालत ने एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए राज्य सरकार को दो माह के भीतर अभियुक्त को एक लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि यह उसके कानूनी अधिकारों एवं दलीलों से पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना सांकेतिक राशि है. जैसे ही जज ने फैसला सुनाया, दलित अभियुक्त फूट-फूटकर रो पड़ा. उसके जेहन में छह साल बाद अपने परिवार के साथ होने का अहसास था, लेकिन रिहाई के एक माह बाद भी वह अपनी आजादी को महसूस करने की कोशिश मात्र कर रहा है. उसे कोरोना का टीका लगाया जा चुका है, लेकिन वह बाहर नहीं निकलना चाहता. उसने कहा, “सब कुछ बदल गया है. हर कोई मास्क पहनता है, लोग बाहर जाने के लिए दो बार सोचते हैं. मैंने जेल में कठोर लॉकडाउन बिताया है. ईमानदारी की बात करूं तो मेरा दिमाग अब भी ठीक नहीं है. मैं थोड़े समय बाद बाहर निकलना शुरू करूंगा.”

मैंने क्षमा करना सीख ल‍िया है
जेल में बिताये अपने समय के बारे में उसने कहा कि जेल में पहले के कुछ साल वह गुस्से में रहता था, लेकिन उसने क्षमा करना सीख लिया है. बाइबल की एक कॉपी निकालकर वह कहता है, “मैं बिल्कुल ही नहीं समझता कि इसमें क्या लिखा है. लेकिन मैं जानता हूं कि ईश्वर एक हैं. मैं केस दर्ज करने के लिए उन्हें माफ करता हूं. मुझे अब क्रोध नहीं आता. मुझे दलित होने के नाते फंसाया गया और मेरे जीवन के छह साल मुझसे छीन लिये गए.”

परिवार पर है 5 लाख रुपये का कर्ज
उसकी 58 वर्षीया पत्नी कूड़ा बीनने का काम करती है और अच्छे दिन में 100 रुपये कमाती है. उसके 30 वर्षीय बेटे को एक डेनिम फैक्ट्री में 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने के लिए 12,000 रुपये प्रति माह मिलते हैं. भेदभाव से बचने के लिए घर बदलने और बढ़ते दैनिक खर्चों के कारण उसपर 5 लाख रुपये का कर्ज है. पत्नी, बच्चों, नाती-पोतों और अन्य रिश्तेदारों सहित 12 लोगों का उसका परिवार दो तंग कमरों में अस्थाई बिस्तरों पर सोकर जीवन व्यतीत कर रहा है. उसने तीन महीने का किराया नहीं चुकाया है और मकान मालिक का 20,000 रुपये का कर्ज उसके ऊपर है. लेकिन यह उसकी सबसे बड़ी चुनौती नहीं है. उसकी पत्नी ने कहा, “जिस जगर पर हम आखिरी बार रह रहे थे, उस इलाके के लोग दलितों के रूप में पैदा होने के कारण हमसे नफरत करते थे. दिन-रात, वे हमें वहां से भगाने की कोशिश करते थे.

6 साल पहले, 55 वर्षीय वह व्यक्ति सुरक्षा गार्ड का काम करता था. उसके पूर्व नियोक्ता एक वरिष्ठ बैंक प्रबंधक ने कहा, “उसके कदम तेजी से बढ़ते थे और वह ओवरटाइम भी किया करता था, लेकिन अब वह सड़क पार करने से भी डरता है, वाहनों की हॉर्न की आवाज उसे परेशान करती है और वह अक्सर घर का रास्ता भूल जाता है.” बैंक प्रबंधक ने कोर्ट में उसकी ओर से गवाही भी दी थी.

उस व्यक्ति ने कहा, “मैं स्मार्टफोन का उपयोग करना भूल गया हूं. मैंने इसे चालू और बंद करना सीख लिया है. मैं किराने का सामान भी नहीं खरीद सकता. मैंने अपनी भूख खो दी है. मैं हर समय थका महसूस करता हूं. मैं काम नहीं कर सकता.” तिहाड़ में उन्होंने पेंटिंग सीखी. उनके पसंदीदा विषय राजनेता, हिंदू देवता, बैंक से संबंधित विज्ञापन और अभिनेता दीपिका पादुकोण की पेंटिंग है.

वह कहता है, “इसने मुझे मानसिक रूप से स्वस्थ रखा. मैंने लॉकडाउन जेल में बिताया. यह अधिक कठोर था. मैं एक दर्जन अन्य लोगों के साथ एक कोठरी के अंदर सोया, जहां कोई सामाजिक दूरी नहीं थी. लॉकडाउन के कारण मैं अपनी पत्नी से बात नहीं कर सकता था. लेकिन मैं बच गया.” अब जब उसका मुकदमा खत्म हो गया है, वह राजस्थान में अपनी बीमार मां से मिलने जाना चाहता है. उसने कहा, “वह मुझे फोन करती रहती है, फोन पर रोती रहती है. मेरे पास मां से मिलने जाने के लिए पैसे नहीं हैं. न ही मुझमें ताकत है. मैं उससे मिलना चाहता हूं. “

error: Content is protected !!